-ईर्ष्या एक ऐसा शब्द है जो मनुष्य के स्वयं के जीवन को तो तहस-नहस करता है

*साधना पथ*

भाग 180

साधको -ईर्ष्या एक ऐसा शब्द है जो मनुष्य के स्वयं के जीवन को तो तहस-नहस करता है औरों के जीवन में भी उथल पुथल मचा देता है। यदि हम आप किसी को सुख या प्रसन्नता नहीं दे सकते तो कम से कम दूसरों के सुख और प्रसन्नता देखकर दुखी नही होना चाहिये। यदि हमको आपको खुश नहीं होना है न सही मत होइए खुश, परन्तु किसी की खुशियों को देखकर अपने आपको ईर्ष्या की आग में ना जलाएं।
प्रायः समाज में देखा जाता है कि कोई आगे बढ़ रहा है,किसी की उन्नति हो रही है, नाम हो रहा है किसी का अच्छा हो रहा है तो अधिकांश लोग ऐसे देखने को मिलेंगे जो पहले यह सोचेंगे, कैसे आगे बढ़ते लोगों की राह का रोड़ा बना जाए। उनको कैसे नीचा दिखाया जाए। कैसे समाज में उनकी हंसी बने और कैसे उनकी खुशियां छीनी जाए।
साधकों -बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो किसी को आगे बढ़ता देख किसी की उन्नति होते देख आनंद का अनुभव करते हैं या प्रसन्न होते हैं ।
हमको ,आपको नहीं लगता कि हमें हमारी इर्ष्या जलाती है? बाद में सामने वाले का नुकसान होता है? क्यूंकि इर्ष्या करते वक़्त हमारे मस्तिष्क के स्नायु सिकुड़ते हैं जिसका प्रभाव हमारे अंतर्मन पर पड़ता है और इसका प्रभाव हमारी दिनचर्या पर पड़ता है। हम चिड़चिड़े हो जाते हैं और घर के लोगों के साथ हमारा व्यवहार गलत ढंग का हो जाता है जब घर का वातावरण कलहपूर्ण हो जाता है और हमारा स्वाभाव झगड़ालू हो जाता है तो समाज का कोई व्यक्ति ऐसे व्यक्ति को स्वीकार नही करता ।
मेरा मानना है कि यदि आप किसी की खुशियों से खुश होकर उसे और आगे बढ़ने का प्रोत्साहन देंगे तो इससे दो फायदे होंगे एक तो समाज में आपकी छबि अच्छी बनेगी दूसरे हमे आपको एक आन्तरिक प्रसन्नता का एहसास होगा और एक सकारात्मक ऊर्जा का विकास अपने आप हमारे आपके अन्दर होगा।
इसे मनुष्य की कमजोरी कह लीजिए या कुछ और परन्तु सच यह है कि बहुत सारे दुखों का कारण हमारा अपना दुःख ना होकर दूसरे की प्रसन्नता होती है। हमे आपको इससे ऊपर उठने का प्रयास करना चाहिये । हमे आपको सिर्फ अपने आप को आगे बढ़ाते रहना है और व्यर्थ की तुलना के पचड़े में नहीं पड़ना है। तुलना नहीं करनी हमे आपको ईर्ष्या करने के बजाय सामने वाले मनुष्य के गुणों को अपनाएं और जीवन में उनसे कुछ सीखें और लाभ लें ताकि हमारा आपका जीवन भी खुशहाल हो।