प्रकृति प्रेमी समीर ने पौधारोपण कार्य कर बनाई अलग पहचान


▪️ वृक्षारोपण को संस्कार से जोड़ने की चलाई मुहिम

बिभूति भूषण भद्र दैनिक समाज जागरण झाड़ग्राम पश्चिम बंगाल

पश्चिम मेदिनीपुर के शालबनी प्रखंड अंतर्गत मधुपुर निवासी तथा भारतीय रेलवे में कार्यरत रेल कर्मी समीर देबसिंघा का प्रकृति के प्रति ऐसा अगाध प्रेम बहुत कम ही देखने को मिलता हैं। खड़गपुर रेल मंडल के मेदिनीपुर में संकेत एवं दूरसंचार विभाग में सहायक हेल्पर के पद पर कार्यरत समीर देबसिंघा ने वर्ष 2018 में अपने शादी में अपने पत्नी के साथ परिणय पौध रोपित कर वृक्षारोपण को संस्कार से जोड़ने की मुहिम चलाया। पृथ्वी के साथ मानव के अस्तित्व की रक्षा हेतु बच्चों के जन्मदिवस तथा प्रतिवर्ष विवाह वर्षगांठ के अवसर पर पौधे दान कर उनसे पौधे रोपित कराते हैं। ड्यूटी से छुट्टी मिलने या फिर अवकाश के दिनों में वे अपने बाइक में पौधे लादकर किसी ना किसी विद्यालय गांव या रिश्तेदारों के घर पहुंच कर वहां पौधा रोपित कराते हैं।लोगों को पौधे का महत्व समझाते हैं। इन्होंने मधुपुर स्थित विनापाणी उच्च विद्यालय परिसर में 50 पौधे लगाए, गांव के मुख्य मार्ग के दोनों ओर लगभग 200 पौधे, अपने ससुराल झाड़ग्राम जिला अंतर्गत बंक्सोल में भी सैकड़ो पौधे, गांव के गीतांजलि क्लब तथा अपने विभागीय कार्यालय सहित विभिन्न ग्रामों में निजी खर्च पर हजारों पौधे लगाने का कृतिमान हासिल की है। प्रकृति के प्रति उनके अगाध प्रेम होने के कारण अपने घर के आस-पास व गांव में पौधों को रोपित कराकर अपने गांव को हरा भरा रखने का प्रयास कर रहे हैं। पर्यावरण के महत्व को समझाते हुए पूरे इलाके में उन्होंने लोगों को पौधे लगाने के लिए हमेशा जागरुक करते रहते हैं। उनकी मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए उनकी पत्नी दीपिका देबसिंघा नन्हा बेटा सप्तम देवसिंघा हमेशा इन्हें उत्साहित करती हैं। गांव के गीतांजलि क्लब में निर्मित वाटिका “कुंज छाया ” मे 24 घंटे ऑक्सीजन देने वाले पौधे के अतिरिक्त विभिन्न तरह के फल फूल के वृक्षों से सजाया गया है। यादगार के रूप में प्रतिवर्ष पर्यावरण दिवस के मौके पर यहां विभिन्न तरह के जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। वहीं 77 वां स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मालबांधी स्थित चांदाविला गांव के सड़क किनारे 77 वृक्षारोपण भी किया गया।

*पेड़ पौधों से माता-पिता का स्पर्श मिलता है*
एक मुलाकात के दौरान समीर देबसिंघा ने दैनिक समाज जागरण को बताया की जंगल महल इलाके में माओवादी आंदोलन के दौरान वर्ष 2009 में उनके पिता की हत्या हो गई। महज एक वर्ष के अंतराल में मां की भी हत्या कर दी गई । वे उस समय काफी छोटे थे। उस दरम्यान वे सरकारी शिविर में रहा करते थे। बाद में अपने मामा के यहां रहकर शिक्षा ग्रहण किए। मुआवजे के आधार पर तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी द्वारा उन्हें रेलवे में नौकरी दी गई। श्री देबसिंघा ने गंभीर होते हुए कहा जिस स्थान पर माता पिता के खून से लाल रक्त रंजीत छवि को देखा हूं। उस जगह को हरे-भरे कर वृक्षों को अपने माता पिता के रूप में पाता हूँ।