देशभर में आवारा जानवरों का आतंक : एस एन वर्मा


आवारा जानवरों ने पूरे देश में आतंक मचा रखा है। एक जमाने में इक्के-दुक्के ही कुत्ते के काटने के समाचार मिलते थे। लेकिन आज आवारा जानवरों ने गांव,कस्बा और शहर ही नहीं महानगरों में भी लोगों का जीना दूभर कर रखा है। हालकि घटनाओं पर नजर डालें तो पता चलता है कि आवारा ही नहीं पालतु कुत्तों ने भी अनजान या अपने घर के लोगांें को भी न सिर्फ काट खाया हैं बल्कि नोंच नांेच कर मार तक डाला हैं। सुबह प्रातः भ्रमण पर निकले या देर रात काम से घर लौटनेवाले लोग आवारा कुत्तों के शिकार बन रहे हैं। कुत्तों का आतंक इतना कि कई जगह तो बच्चे,बुजुर्ग और महिलाओं ने सुबह टहलना ही छोड़ दिए हैं। सरकार ने तो दोषी कुत्ता पालकों के खिलाफ कानून तक बनायी है लेकिन स्थिति जस का तस है। गांवों मे ंतो बकरियों के छोटे छोटे बच्चों को अपना निवाला बना कर गरीब बकरी पालकों को कुत्ता आर्थिक नुकसान पहुंचा रहा है। आवारा जानवरों के उत्पात को लेकर संसद तक में आवाज उठने लगी है।
देश में कुत्तों के काटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। साल 2023 में कुत्तों के काटने के मामलों की संख्या 2.75 करोड़ थीं। कुत्तों के काटने की घटनाओं में साल-दर-साल 26.5 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है।.केरल, झारखंड, दिल्ली, असम, और चंडीगढ़ में कुत्तों के काटने की घटनाओं में सबसे ज़्यादा वृद्धि हुई है। अकेले दिल्ली में साल 2023 में कुत्तों के काटने के मामलों में साल-दर-साल 143 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। लैंसेट इन्फ़ेक्शियस डिज़ीज़ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक भारत में हर चार में से तीन जानवरों के काटने का कारण कुत्ते हैैं। भारत में रेबीज़ के कारण हर साल 5,700 से ज्यादा लोगों की मौत होने का अनुमान है। कुत्तो ंऔर बंदरों जैसे आवारा पशुओं से संबंधित मुद्दे और उनसे होने वाली घटनाएं तथा ऐसी घटनाओं को रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं। राज्यों व संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (एकीकृत स्वास्थ्य सूचना प्लेटफॉर्म) पोर्टल पर दिए गए आंकड़ों के अनुसार, देश भर में पिछले साल 2024 में कुत्ते काटने के 21 लाख 95 हजार 122 मामले सामने आए हैं जिसमंे से 37 व्यक्तियों मौत भी हुई है। जबकि बंदरों के काटने के 5 लाख 4 हजार 728 घटनाएं सामने आई हैं जिनमें से 11 लोग काल के गाल में समा चुके हैंे। जनवरी-दिसंबर 2024 के दौरान देशभर में 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कुत्ते के काटने के 519704 मामले सामने आए।
आवारा पशुओं से होने वाली सबसे बड़ी समस्याओं में से एक यह है कि वे गंदगी और बीमारियाँ फैलाते हैं। कुत्ते अक्सर कचरे के डिब्बे में खाना तलाशते हैं, जिससे वे हानिकारक बैक्टीरिया और परजीवियों के संपर्क में आ जाते हैं और ये बैक्टीरिया और परजीवी कुत्तों या उनके मल के संपर्क के माध्यम से मनुष्यों में फैल सकते हैं। आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या लोगों के लिए सिरदर्द और जान को खतरा बन रही है। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों ने आंखों पर पट्टी बांध रखी है।
शहरों में सबसे ज्यादा आवारा सांड, सूअर व कुत्ते हैं। इसके बाद गायों का नंबर आता है। शहरांे में कुछ लोगों ने गाय पाल रखी हैं, लेकिन अधिकांश लोग दूध निकालने के बाद गायों को डंडा मारकर सड़क पर इधर-उधर चारे के लिए मुंह मारने को छोड़ देते हैं। सड़क और सार्वजनिक स्थलों पर मंडराते आवारा पशु भी लोगों की जान के लिए खतरा बन गए हैं। इसी प्रकार गली मोहल्लों में भी आवारा पशुओं का जमावड़ा रहता है। आवारा पशु झुंड में रहते हैं जो किसी पर अटैक करें तो बचना मुश्किल है। दूसरी ओर कुत्तों का आंतक हर गली मोहल्ले में है। आवारा पशुओं को पकड़कर गोशाला या जंगल में छोड़ने की ड्यूटी स्थानीय निकायों की है लेकिन उनकी लापरवाही से शहर में आवारा जानवर दिन पे दिन बढ़ रहे हैं।
आवारा पशुओं में सबसे ज्यादा कुत्तों से ही देशवासी त्रस्त हैं। केंद्रीय विधान आवारा कुत्तों सहित पशुओं के प्रति क्रूरता पर प्रतिबंध लगाता है। इसमें कहा गया है कि आवारा कुत्तों की संख्या के प्रबंधन के लिये एकमात्र स्वीकार्य तरीका मानव द्वारा पशु बंध्याकरण कार्यक्रम है। आवारा कुत्तों को पीटा नहीं जा सकता, भगाया नहीं जा सकता, कहीं और छोड़ा नहीं जा सकता, और न ही मारा जा सकता है। आवारा कुत्तों की सुरक्षा के लिए पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (पीसीए) 1960 के तहत कानून बनाए गए हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 428 और 429 के तहत कुत्तों समेत किसी भी आवारा जानवर को छेड़ना या उसके साथ बुरा व्यवहार करना अपराध है। अधिकारी इन्हीं कानूनों की आड़ में कुत्तों को न पकड़ने का तमाम बहाना बनाते हैं और यह तर्क देते हैं कि कुत्ता पकड़ने पर विरोध होने लगता है। वहीं कुत्ता प्रेमी सीना तान कर बोलते हैं कि संविधान ने आवारा पशुओं को भोजन कराने का अधिकार दिया है और कोई भी हमें ऐसा करने से नहीं रोक सकता। उन्हें अपने इस गैर जिम्मेदाराना व्यवहार से कुत्तों से समाज को होने वाले नुकसान से कोई मतलब नहीं होता। आवारा पशओं के लिए निर्धारित फीडिंग प्वाइंट पर ही खाना देना चाहिए।
सरकार ने कुत्ता पालकों के लिए नियम भी बनाए हैं। पालतू कुत्ता पालने के लिए लाइसेंस लेना ज़रूरी होता है। लाइसेंस न लेने पर 5 हजार तक जुर्माना लग सकता है और कुत्ते को जब्त भी किया जा सकता है। कुत्ते के काटने से किसी की मौत होने पर आईपीसी की धारा 337 के तहत मामला दर्ज होता है।कुत्ता पालकों को रैबीज टीका लगाने का प्रमाण पत्र और कुत्ता पालन करने का शपथ पत्र देना पड़ता है। शपथ पत्र इस बात का होता है कि कुत्ता पालने से आसपास के निवासियों को कोई आपत्ति नहीं है। 200 वर्ग मीटर के क्षेत्रफल तक के मकानों में दो कुत्ते पालने की ही अनुमति दी जाती है।
केंद्र सरकार ने राज्यों को पिटबुल टेरियर, अमेरिकन बुलडॉग, रॉटवाइलर और मास्टिफ्स सहित 23 नस्लों के आक्रामक कुत्तों की बिक्री और प्रजनन पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया है। कुत्ते के काटने पर पीड़ित  व्यक्ति मुआवजा के लिए भी दावा कर सकता है। हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार कुत्ते के काटने पर पीड़ित को वित्तीय सहायता न्यूनतम 10 हजार रुपए दी जाएगी। यह रकम शख्स के शरीर पर कुत्ते की ओर से काटे गए प्रति दांत के हिसाब से दी जाएगी।
आवारा पशुओं के उत्पात केा लेकर संसद में भी आवाज उठी है। फरवरी माह में मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह को लोकसभा में एक लिखित उत्तर देना पड़ा। अब देखना है कि इन आवारा पशुओं के आतंक से देशवासियों को कब निजात मिलेगी।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार हैं)

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