ना ठीक से बोल पाता ! ना ही चल पाता था, लेकिन बेहतर इलाज होने के बाद नाचने-गाने लगा कन्हैया*

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*बच्चों का अस्पताल ! डॉ. बीडी शर्मा एवं उनकी टीम की मेहनत रंग लाई*

*इलाज के बाद, दिव्यांग बच्चे को मिली जुबान चलने योग्य बना पैर*

दैनिक समाज जागरण गया ब्यूरो गजेन्द्र कुमार

एक बच्चे जन्म से ही, ना सही से बोल पाता था और ना ही चल पाता था. उसकी जन्मजात विकृति का पता तब चला जब वह चलने – बोलने की उम्र में पहुंचा अस्पताल, बच्चे की इस अपंगता का पता चलते ही उसके माता पिता पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, लेकिन पति – पत्नी ने हिम्मत नहीं हारी और अपने जिगर के टुकड़े को तंदुरुस्त करने के लिए एड़ी चोटी एक कर दिया. कई शहरों में नामचीन डॉक्टरों से उसका इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. थक हार कर पति-पत्नी अपने बच्चे को लेकर गया शहर के जी०बी रोड नई गोदाम, आनंदी माई मंदिर के समीप बच्चों का अस्पताल पहुंचे, जहां डॉ. बी०डी शर्मा द्वारा इलाज के बाद बच्चा बेधड़क बोलने लगा और अपने पैरों के सहारे चलने, नाचने लगा
इस दिव्यांग बच्चे का इलाज करने वाले डॉ. बी०डी० शर्मा ने बताया कि करीब दो महीना पूर्व अरवल के कुर्था प्रखंड के मांझीयावां गाँव के रहने वाले मृत्युंजय कुमार अपने साढ़े छह साल के अपंग बच्चे को लेकर अस्पताल में इलाज कराने आए थे. बच्चा ना तो ठीक से खड़ा हो पाता था और ना ही बोल पता था. डॉ. शर्मा ने आगे बताया कि बच्चे के माता पिता से पूर्व में कराए गए इलाज की पूरी जानकारी लेने के बाद उन्होंने ने इलाज शुरू किया और अब बच्चा बेहिचक बोल रहा है और चल भी रहा है.
इधर, बच्चे के पिता ने बताया कि उन्होंने अपने दिव्यांग बच्चे का गया, पटना से लेकर वाराणसी तक कई बड़े डॉक्टरों से इलाज करवाया, लेकिन हर जगह निराशा ही हाथ लगी. घर परिवार के लोग बच्चे के ठीक होने की उम्मीद खो चुके थे. पड़ोसी से लेकर रिश्तेदार तक उसके स्वस्थ होने की दुआ मांग रहे थे l. इसी दौरान एक परिचित के बताने पर वे आखिरी उम्मीद लेकर डॉ. बीडी शर्मा के पास पहुंचे और आज डॉक्टर साहब और उनकी टीम के सार्थक प्रयास और बेहतर ईलाज होने से उनका बच्चा अन्य सामान्य बच्चों की तरह बोलने और चलने योग्य बन गया इसके लिए डॉक्टर साहब एवं उनके बड़े भाई सह अस्पताल के व्यवस्थापक धर्मेंद्र कुमार का जितना भी शुक्रिया अता की जाय कम ही होगा. आज अपने बच्चे को तंदुरुस्त देख कर यह विश्वास होता है कि डॉक्टर भगवान का दूसरा रूप जरूर होता है. साथ ही अस्पताल के स्टाफ अबोध कुमार, रमेश कुमार, बबलू कुमार आदि को भी उनसे मिले सहयोग के लिए धन्यवाद देता हूं..