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सोन नदी के प्रतिबंधित सेंचुरी क्षेत्र में कथित अवैध खनन का आरोप, रुद्रा माइनिंग कंपनी पर उठे सवाल

पोकलेन मशीनों और नावों से बालू-मौरंग निकालने का ग्रामीणों ने लगाया आरोप, वन विभाग और खनन विभाग से निष्पक्ष जांच की मांग

समाज जागरण/जिला ब्यूरो प्रमुख विजय कुमार अग्रहरी

सोनभद्र। सोन नदी के प्रतिबंधित सेंचुरी क्षेत्र में कथित अवैध खनन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। महलपुर क्षेत्र के अंतर्गत भगवा सोन नदी में बालू-मौरंग के कथित अवैध उत्खनन को लेकर स्थानीय ग्रामीणों ने मेसर्स रुद्रा माइनिंग कंपनी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों का दावा है कि नदी में पोकलेन मशीनों और बड़ी नावों के माध्यम से बालू-मौरंग निकाली जा रही है। उन्होंने मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई करने की मांग की है।

ग्रामीणों के अनुसार, कथित खनन गतिविधियां दिन के साथ-साथ रात के अंधेरे में भी संचालित होने की आशंका है। आरोप है कि नदी से निकाली गई बालू-मौरंग को किनारे लाकर ट्रकों और डंपरों के जरिए बाहर भेजा जाता है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित कंपनी का पक्ष भी सामने आना बाकी है।

प्रतिबंधित क्षेत्र में खनन को लेकर उठे सवाल

मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू संबंधित क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण से जुड़े प्रतिबंधों की स्थिति है। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि उक्त स्थान पर खनन प्रतिबंधित है, तो वहां भारी मशीनों और नावों के इस्तेमाल की अनुमति कैसे मिली? क्या संबंधित विभागों को इन गतिविधियों की जानकारी है? यदि जानकारी है, तो अब तक क्या कार्रवाई की गई है?

स्थानीय लोगों ने वन विभाग, खनन विभाग और जिला प्रशासन से मौके का निरीक्षण कराने तथा खनन पट्टे, स्वीकृत क्षेत्र, अनुमति की शर्तों और संबंधित प्रतिबंधों की जांच करने की मांग की है। उनका कहना है कि जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी और जिम्मेदारी तय की जा सकेगी।

नदी और वन्यजीवों के संरक्षण पर चिंता

ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि यदि संवेदनशील नदी क्षेत्र में नियमों के विरुद्ध भारी मशीनों से खनन किया जा रहा है, तो इससे नदी की प्राकृतिक संरचना और पर्यावरण को नुकसान पहुंच सकता है। अनियंत्रित खनन से नदी के तल, तटों के कटाव, जल प्रवाह और जलीय जीवों के आवास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।

ऐसे में संबंधित अधिकारियों द्वारा स्थल का निरीक्षण कर पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करना आवश्यक है। साथ ही यह भी जांच की जानी चाहिए कि खनन गतिविधियां निर्धारित नियमों और वन्यजीव संरक्षण संबंधी प्रावधानों के अनुरूप हैं या नहीं।

भारी वाहनों की आवाजाही से ग्रामीण परेशान

महलपुर और आसपास के ग्रामीणों ने कथित खनन से जुड़े परिवहन को लेकर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि बालू-मौरंग की ढुलाई में भारी वाहनों की आवाजाही से ग्रामीण सड़कों पर दबाव बढ़ सकता है। सड़क क्षति और दुर्घटनाओं की आशंका को देखते हुए परिवहन मार्गों की भी जांच कराई जानी चाहिए।

ग्रामीणों ने मांग की है कि खनन स्थल से लेकर परिवहन मार्ग तक की स्थिति का निरीक्षण किया जाए। यदि किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

वन विभाग और खनन विभाग की भूमिका पर सवाल

कथित अवैध खनन को लेकर स्थानीय लोगों ने वन विभाग, खनन विभाग और जिला प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। ग्रामीण जानना चाहते हैं कि संबंधित क्षेत्र में खनन की वैधता की जांच कब होगी और शिकायतों पर प्रशासन क्या कदम उठाएगा।

हालांकि, संबंधित विभागों की आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है। इसलिए आरोपों की पुष्टि के लिए प्रशासनिक जांच और संबंधित पक्षों का बयान महत्वपूर्ण होगा।

कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन की चेतावनी

ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि सोन नदी के कथित अवैध खनन की निष्पक्ष जांच कर प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई, तो वे जिला स्तर पर आंदोलन करने को मजबूर होंगे। उनकी मांग है कि संबंधित स्थल का तत्काल निरीक्षण कराया जाए, खनन की अनुमति और पट्टे की शर्तों की जांच हो तथा नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए।

फिलहाल सोन नदी के संरक्षण और कथित अवैध खनन को लेकर उठे सवालों पर प्रशासन की प्रतिक्रिया का इंतजार है। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग मामले की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करते हैं या नहीं।


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