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नशा, संवेदना और बचपन।

नौजवानों को निगलता नशे का अदृश्य संकट।


           स्वामी विवेकानंद ने कहा था हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो चरित्र का निर्माण करे, मन का बल बढ़ाए और मनुष्य को अपने पैरों पर खड़ा कर दे, नशा  शिक्षा, चरित्र और आत्मबल तीनों का सबसे बड़ा शत्रु है। मानव जीवन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी संवेदना और बचपन की मासूमियत है। संवेदना मनुष्य को मनुष्य बनाती है और बचपन उसके व्यक्तित्व की नींव रखता है। किंतु आज नशीले पदार्थों का बढ़ता जाल इन दोनों पर सबसे कड़ा प्रहार कर रहा है। नशा केवल शरीर को नहीं, बल्कि विवेक, करुणा, परिवार, शिक्षा, संस्कृति और भविष्य को भी नष्ट कर देता है। जिस आयु में बच्चों के हाथों में पुस्तकें और सपने होने चाहिए, वहाँ यदि नशे का जहर पहुँच जाए तो आने वाला पूरा जीवन अंधकारमय हो जाता है।

भारत में पिछले कुछ वर्षों में ड्रग्स, सिंथेटिक नशे, हेरोइन, चरस, गांजा, अफीम तथा नशीली गोलियों का प्रसार चिंताजनक रूप से बढ़ा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय तथा विभिन्न सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार देश में करोड़ों लोग किसी न किसी प्रकार के मादक पदार्थों का सेवन करते हैं। 2019 के राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 16 करोड़ लोग शराब, 3 करोड़ से अधिक लोग भांग या गांजा तथा लगभग 2.3 करोड़ लोग ओपिओइड (अफीम, हेरोइन आदि) का सेवन करते पाए गए। इनमें बड़ी संख्या 10 से 17 वर्ष और 18 से 25 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की है।

सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में पंजाब, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र तथा गोवा प्रमुख हैं। पंजाब में हेरोइन और सिंथेटिक ड्रग्स का गंभीर संकट लंबे समय से चिंता का विषय है। पूर्वोत्तर के राज्यों में सीमा पार से होने वाली तस्करी ने युवाओं को प्रभावित किया है। राजस्थान और गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी मादक पदार्थों की तस्करी लगातार बढ़ी है।

महानगरों में नशीली गोलियां, कोकीन और पार्टी ड्रग्स तेजी से फैल रहे हैं। सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि नशे की शुरुआत अब किशोरावस्था में ही होने लगी है। विद्यालय छोड़ने वाले बच्चों, पारिवारिक विघटन, बेरोजगारी, सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव, गलत संगति तथा मानसिक तनाव के कारण अनेक बच्चे नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं। परिणामस्वरूप पढ़ाई छूट जाती है, अपराध बढ़ते हैं, हिंसा और आत्महत्या की प्रवृत्ति विकसित होती है तथा परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से टूटने लगते हैं। नशा सबसे पहले मनुष्य की संवेदना को समाप्त करता है। जो व्यक्ति कभी माता-पिता के प्रति श्रद्धावान था, वही नशे की लत में उनके साथ दुर्व्यवहार करने लगता है। परिवार की जमा पूंजी नशे में समाप्त हो जाती है। अनेक युवा चोरी, लूट और अन्य अपराधों की ओर बढ़ जाते हैं। धीरे-धीरे रिश्तों की गर्माहट समाप्त होने लगती है और मनुष्य केवल नशे का दास बनकर रह जाता है।


महात्मा गांधी ने कहा था शराब और नशा मनुष्य की आत्मा का पतन कर देते हैं। डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर का संदेश था शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो। यह संदेश नशामुक्त समाज की स्थापना के लिए भी उतना ही आवश्यक है। नशे के विरुद्ध केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं। परिवार, विद्यालय, समाज, धार्मिक संस्थाएँ, मीडिया तथा शासन सभी को मिलकर कार्य करना होगा। बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना, खेल, साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ना, विद्यालयों में नशामुक्ति शिक्षा को अनिवार्य बनाना तथा नशे के शिकार लोगों के पुनर्वास की प्रभावी व्यवस्था करना समय की आवश्यकता है। सीमाओं पर तस्करी रोकने के साथ-साथ ऑनलाइन अवैध नेटवर्क पर भी कठोर कार्रवाई आवश्यक है।


यदि किसी राष्ट्र का बचपन सुरक्षित है तो उसका भविष्य भी सुरक्षित है। लेकिन यदि बचपन नशे की गिरफ्त में चला गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल आर्थिक ही नहीं, नैतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी कमजोर हो जाएँगी। इसलिए नशे के विरुद्ध संघर्ष केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का अभियान है।


आइए संकल्प लें कि हम अपने घर, विद्यालय, समाज और कार्यस्थल पर नशामुक्ति का संदेश फैलाएँगे। हर बच्चे के हाथ में नशा नहीं, पुस्तक होगी; हर युवा की आँखों में धुंध नहीं, सपने होंगे; और हर परिवार में भय नहीं, संवेदना और विश्वास का वातावरण होगा। यही स्वस्थ, सशक्त और विकसित भारत की वास्तविक पहचान बनेगी।


               वर्ष 2025–26 तक उपलब्ध सरकारी आँकड़े बताते हैं कि भारत में नशीले पदार्थों की समस्या केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और बाल संरक्षण का गंभीर संकट बन चुकी है। गृह मंत्रालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय तथा राष्ट्रीय मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो के अनुसार नशे की तस्करी पर लगातार कार्रवाई के बावजूद इसकी पहुँच बच्चों और युवाओं तक बढ़ रही है।


सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय तथा एम्स के राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 10–17 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 20 लाख बच्चे कैनाबिस (गांजा), 40 लाख बच्चे ओपिओइड (अफीम, हेरोइन आदि), 30 लाख बच्चे इनहेलेंट (सूँघने वाले नशीले पदार्थ) तथा लगभग 20 लाख बच्चे नशीली दवाओं (सेडेटिव) के सेवन से प्रभावित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि विद्यालय छोड़ने वाले किशोरों और शहरी मलिन बस्तियों के बच्चों में यह समस्या अपेक्षाकृत अधिक दिखाई दे रही है।


मार्च 2025 में संसद में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार 2023–24 में देशभर के ओपन शेल्टरों में रहने वाले 4,158 बच्चों की पहचान नशे से प्रभावित बच्चों के रूप में की गई। म यह आँकड़े केवल सरकारी आश्रय गृहों में चिन्हित बच्चों के हैं; वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।


गृह मंत्रालय के अनुसार 2020 से मई 2025 तक राष्ट्रीय मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो  ने 116 बड़े अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी मामलों का भंडाफोड़ करते हुए लगभग 1,09,318 किलोग्राम मादक पदार्थ जब्त किए। यह दर्शाता है कि भारत न केवल नशे की खपत बल्कि अंतरराष्ट्रीय तस्करी के नेटवर्क की चुनौती से भी जूझ रहा है।


डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का विश्वास था— “यदि देश को विकसित बनाना है तो युवाओं को सही दिशा देनी होगी।” इसलिए नशामुक्त बचपन केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि विकसित भारत की आधारशिला है।आवश्यकता केवल कठोर कानूनों की नहीं, बल्कि परिवार, विद्यालय, समाज, मीडिया और प्रशासन के संयुक्त प्रयासों की है। प्रत्येक बच्चे को स्नेह, संस्कार, खेल, साहित्य और रचनात्मक वातावरण मिले यही नशे के विरुद्ध सबसे प्रभावी और स्थायी उपाय है। संवेदनशील बचपन ही संवेदनशील समाज का निर्माण करता है; यदि बचपन बचा रहेगा, तभी भारत का भविष्य सुरक्षित रहेगा।

संजीव ठाकुर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिंतक,स्तंभकार, रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,

कविता,

संजीवनी।

गर दिल है तो धड़कना भी चाहिए।

गर दिल है तो धड़कना भी चाहिए,
हाथ मदद को फड़कना भी चाहिए।

पराये आँसू देख के चुप रह न जाइए,
इंसानियत के लिए तड़पना भी चाहिए।

नफ़रत की आग यूँ बुझ जाए मित्रों
उल्फ़त का दीप भड़कना भी चाहिए।

सिर्फ़ आरज़ू से मंज़िलें मिलती नहीं जनाब,
राहों में ख़ुद को खपना भी चाहिए।

रोटी अगर मिली है मुकद्दर से आपको
भूखो के साथ बराबर बँटना भी चाहिए।

सच की चाहत तो हर दौर में है हमें,
ज़ालिमों के सामने कड़कना भी चाहिए।

संजीव दुआ है आदमी का दिल
संवेदना में धड़कना भी चाहिए।

संजीव ठाकुर,रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415,


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