*नई दिल्ली:** भारत में गंभीर रूप से बीमार बुज़ुर्ग मरीजों के लिए वेंटिलेटर सपोर्ट जीवन-मृत्यु के बीच आखिरी उम्मीद माना जाता है। लेकिन जब डॉक्टर स्पष्ट रूप से बताते हैं कि अब मरीज में किसी तरह की चिकित्सीय रिकवरी की संभावना नहीं बची है, तब परिवारों को एक बेहद कठिन और दर्दनाक स्थिति का सामना करना पड़ता है। कानूनी प्रक्रियाएँ, चिकित्सा नियम और अस्पतालों की नीतियाँ मिलकर ऐसी परिस्थिति बना देती हैं कि परिजन चाहकर भी वेंटिलेटर हटाने का अनुरोध नहीं कर सकते।
### **अस्पतालों का सीधा इंकार: “हम वेंटिलेटर नहीं हटा सकते”**
सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2018 में पेसिव यूथेनेशिया को सशर्त वैधता मिलने के बावजूद **अस्पताल व्यवहारिक रूप से वेंटिलेटर हटाने से मना कर देते हैं**, क्योंकि:
* मेडिकल नेग्लिजेंस के आरोपों का डर
* कोई “लिविंग विल” न होना
* जटिल कानूनी प्रक्रिया
* पुलिस या प्रशासनिक जांच का जोखिम
इसी कारण से अधिकतर अस्पताल परिजनों से कहते हैं—
**“मरीज को डिस्चार्ज कराइए, लेकिन वेंटिलेटर हम नहीं हटाएंगे।”**
### **परिवारों के सामने एकमात्र रास्ता — घर ले जाओ**
व्यवहारिक रूप से यही होता है कि परिवार:
* प्राइवेट वेंटिलेटर की व्यवस्था करते हैं
* मरीज को अस्पताल से डिस्चार्ज कराते हैं
* और अंतिम समय घर पर बिताने की उम्मीद में ले जाते हैं
यह प्रक्रिया न सिर्फ मानसिक रूप से तोड़ने वाली है, बल्कि आर्थिक रूप से भी बहुत भारी पड़ती है। ICU का खर्च प्रतिदिन हजारों से लेकर लाखों तक पहुँच सकता है, वहीं घर पर वेंटिलेटर और नर्सिंग का खर्च भी कम नहीं है।
### **परिवारों की वेदना: “हम जानते हैं कि वह वापस नहीं आएंगे, फिर भी यह बोझ हम पर क्यों?”**
परिजनों का कहना है कि इस संवेदनशील समय में सिस्टम उन्हें सहारा देने की बजाय और अधिक असहाय बना देता है।
एक परिजन ने बताया:
**“डॉक्टर कह रहे थे कि कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन अस्पताल वेंटिलेटर हटाने को तैयार नहीं था। हमें मजबूरी में घर पर मशीन लगवानी पड़ी। यह सब बहुत पीड़ादायक है।”**
### **मामले में सुधार की ज़रूरत**
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में “Dignity in Dying” यानी **सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार** अभी भी व्यवहारिक रूप से उपेक्षित है। पेलिएटिव केयर, पारदर्शी मेडिकल बोर्ड और अस्पतालों के लिए कानूनी सुरक्षा जैसे उपाय देश में अभी सुदृढ़ नहीं हुए हैं।
### **एक बड़ा सवाल खड़ा होता है**
**क्या भारत का वेंटिलेशन और एंड-ऑफ़-लाइफ सिस्टम परिवारों की पीड़ा को कम करने के बजाय और बढ़ा रहा है?**
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस दिशा में ठोस और मानवीय सुधार की आवश्यकता है, ताकि परिवारों को अपने प्रियजनों के अंतिम समय में सम्मान के साथ निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिल सके




