जान जोखिम में डालकर रेलवे ट्रैक पार कर रहे यात्री, आरपीएफ-जीआरपी की निगरानी पर भी उठे सवाल
समाज जागरण/ आदिवासी सुनील त्रिपाठी
चोपन/ सोनभद्र। स्थानीय रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की सुरक्षा को लेकर एक बेहद गंभीर तस्वीर सामने आई है। स्टेशन परिसर में यात्रियों के सुरक्षित आवागमन के लिए ओवरब्रिज मौजूद है, इसके बावजूद बड़ी संख्या में यात्री जान जोखिम में डालकर रेलवे ट्रैक पार करते हुए एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म की ओर जाते दिखाई दे रहे हैं। सामने आई तस्वीरें रेलवे स्टेशन की सुरक्षा व्यवस्था की हकीकत बयां करने के लिए काफी हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ट्रैक पार करने वालों में महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और भारी सामान लेकर चल रहे यात्री भी शामिल हैं। यात्री एक नहीं, बल्कि कई रेलवे लाइनों को पार कर रहे हैं। इस दौरान यदि किसी ट्रैक पर अचानक ट्रेन आ जाए या कोई यात्री अपना संतुलन खो दे तो कुछ ही सेकेंड में बड़ा हादसा हो सकता है। एक चूक और जा सकती है जान रेलवे ट्रैक पर चलना या उसे पार करना कितना खतरनाक है, यह किसी से छिपा नहीं है। ट्रेन की रफ्तार और उसकी दूरी का सही अंदाजा लगाना हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं होता। ऐसे में ट्रैक पार करते समय की गई छोटी सी लापरवाही भी जिंदगी और मौत के बीच का फैसला बन सकती है।इसके बावजूद चोपन रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का इस तरह ट्रैक पार करना यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर सुरक्षा के इंतजाम कहां हैं और उनकी निगरानी कौन कर रहा है?
ओवरब्रिज है तो ट्रैक पार करने की जरूरत क्यों?
जब यात्रियों के लिए ओवरब्रिज की सुविधा उपलब्ध है, तो फिर उन्हें रेलवे लाइन पार करने से रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं की गई है? क्या ट्रैक की ओर जाने वाले रास्तों को बंद करने, बैरिकेडिंग करने या यात्रियों को सुरक्षित मार्ग की ओर मोड़ने के लिए पर्याप्त कदम उठाए गए हैं?
यदि ऐसे इंतजाम किए गए हैं तो उनके बावजूद यात्रियों की इतनी बड़ी संख्या में ट्रैक पार करना रेलवे की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।आरपीएफ-जीआरपी की मौजूदगी के बावजूद बेखौफ आवाजाही
स्टेशन पर यात्रियों की सुरक्षा और रेलवे परिसर में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आरपीएफ और जीआरपी के जवान तैनात रहते हैं। इसके बावजूद यदि यात्री खुलेआम रेलवे ट्रैक पार करते रहें तो सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जरूरत इस बात की है कि केवल ट्रैक पार करने वाले यात्रियों को रोकने तक ही कार्रवाई सीमित न रहे, बल्कि यह भी देखा जाए कि आखिर यात्री ओवरब्रिज का इस्तेमाल करने के बजाय ट्रैक पार करने का रास्ता क्यों चुन रहे हैं। यदि कहीं रास्ता अधिक सुविधाजनक है या ओवरब्रिज तक पहुंचने में परेशानी है तो रेलवे प्रशासन को उसकी भी जांच करनी चाहिए।
हादसे के बाद नहीं, पहले जागे रेलवे प्रशासन
स्थानीय लोगों का कहना है कि रेलवे प्रशासन को इस गंभीर मामले को महज यात्रियों की लापरवाही मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। स्टेशन पर ऐसे स्थानों को चिन्हित कर बैरिकेडिंग, चेतावनी बोर्ड, नियमित उद्घोषणा और आरपीएफ-जीआरपी की प्रभावी निगरानी सुनिश्चित की जानी चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि ट्रैक पार करते समय किसी यात्री की जान चली गई तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या रेलवे प्रशासन किसी अनहोनी का इंतजार कर रहा है?
चोपन रेलवे स्टेशन पर सामने आई तस्वीरें किसी एक यात्री की लापरवाही नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर चेतावनी हैं। समय रहते यदि रेलवे प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए तो भविष्य में होने वाली किसी दुर्घटना की कीमत किसी परिवार को अपने प्रियजन की जान देकर चुकानी पड़ सकती है। हादसा होने के बाद जिम्मेदारी तय करने से बेहतर है कि हादसे को होने से पहले ही रोक दिया जाए।
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