संजय सोंधी, उपसचिव, भूमि एवं भवन विभाग, दिल्ली सरकार**
वर्तमान में अमेरिकी डॉलर न केवल अमेरिका की मुद्रा है, बल्कि वैश्विक रिजर्व मुद्रा भी है। विश्व व्यापार का लगभग 80% हिस्सा डॉलर में निपटाया जाता है, और सभी केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार का 59% हिस्सा डॉलर में है, जबकि यूरो का हिस्सा मात्र 20% है। विश्व में जारी 64% ऋण पत्र डॉलर में हैं, और 88% विदेशी मुद्रा व्यापार भी डॉलर में होता है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था, जो वैश्विक जीडीपी का 30% हिस्सा है, इसके वित्तीय बाजारों की पारदर्शिता, गहरे ऋण बाजार, और मजबूत राजनीतिक व कानूनी व्यवस्था ने डॉलर को विश्वसनीय बनाया है। अमेरिका द्वारा अपने सहयोगी देशों को सैन्य संरक्षण भी निवेशकों को अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश के लिए प्रेरित करता है।
डॉलर की यह प्रभुता विश्वास पर टिकी है, जो आधुनिक फिएट मुद्रा प्रणाली का आधार है। 1945 से 1971 तक डॉलर सोने से समर्थित था, लेकिन 1971 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इस संबंध को समाप्त कर दिया और आयात शुल्क पर 10% अधिभार लगाया, जिससे अराजकता फैली। फिर भी, मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था और तकनीकी प्रगति ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था और डॉलर को और मजबूत किया।
हालांकि, वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की अप्रत्याशित शुल्क नीतियों और अनिश्चित व्यवहार ने अमेरिका की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनेस्को जैसे वैश्विक मंचों से अमेरिका की धीरे-धीरे वापसी और अपने यूरोपीय व एशियाई सहयोगियों को सैन्य संरक्षण न देने की नीति ने डॉलर के प्रति विश्वास को कम किया है। केंद्रीय बैंकरों, नीति निर्माताओं और निवेशकों का भरोसा डगमगा रहा है।
इस बीच, चीन, जो दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, ने वैकल्पिक भुगतान प्रणाली CIPS विकसित की है, जो लोकप्रियता हासिल कर रही है। रूस और चीन मिलकर अमेरिकी वित्तीय प्रभुत्व को तोड़ने के लिए वैकल्पिक प्रणाली बना रहे हैं। कई देश क्रिप्टोकरेंसी को कानूनी मुद्रा के रूप में मान्यता दे रहे हैं, जो डॉलर के प्रभुत्व के लिए खतरा बन सकता है।
De-Dollarization अब कोरी कल्पना नहीं है; यह जल्द हकीकत बन सकती है। लेकिन चिंता की बात यह है कि कोई अन्य मुद्रा या भुगतान प्रणाली, जैसे SWIFT का विकल्प, अभी डॉलर की जगह लेने को तैयार नहीं है। यह वैश्विक व्यापार और जीडीपी वृद्धि को नुकसान पहुंचा सकता है। यदि विश्वास और स्थिरता बनी रही, तो ही वैश्विक अर्थव्यवस्था इस बदलाव को सहन कर पाएगी।
Sanjaysondhi37@gmail.com
7389254004

Discover more from समाज जागरण
Subscribe to get the latest posts sent to your email.



