इसे विकृतियों से हम सभी को बचाने की जरूरत है।
अजय कुमार ,अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी~ छतरपुर ,पलामू (झारखंड)
रंगों का त्योहार होली प्रेम, उमंग, उत्साह व भावनाओं का महापर्व, इसे विकृतियों से हम सभी को बचाने की जरूरत है।
रंगों का त्योहार होली प्रेम, उमंग, उत्साह व भावनाओं का महापर्व है। होली हमारे जीवन को सरस और गतिशील बनाती है। वैसे होली का परंपरागत स्वरूप अब दिनोंदिन विकृत व बिसरता चला जा रहा है।
पहले होली पर सबको अपने रंग में रंग लेने की, दुश्मन को भी दोस्त बना लेने की चाहत, रंगों से सराबोर , ढोल की थाप पर फागुन के गीतों पर थिरकते युवा-बुजुर्ग-बच्चे वाकई इस पर्व की महत्ता को स्पष्ट करते थे। यही नहीं देवर -भाभी के हास-परिहास, ननद-भौजाइयों की नोकझोंक सचमुच होली को और मधुर एवं जीवंत बनाते थे । होली पर सभी का अबील-गुलाल लेकर घर-घर जाकर सबको लगाना तथा बड़ों से आशीर्वाद और छोटों पर स्नेह लुटाना सचमुच इस त्योहार की महत्ता, गरिमा और भव्यता ही है। यही नहीं, यदि मुहल्ले में किसी से नाराजगी या दुश्मनी भी रहती थी तो वह होली के दिन दूर हो जाती थी । एक दूसरे को रंग लगाकर,गले मिलकर पापड़ तथा गुझियां खाकर सारे गिल-शिकवे दूर हो जाते थे यही तो होली की मुख्य विशेषता है। यही नहीं पहले होली पर मस्ती, उमंग और उल्लास के बीच लोग अपनी मर्यादाओं व गरिमा का उल्लंघन नहीं करते थे।

अब जरा वर्तमान में होली के विकृत होते स्वरूप पर नजर डाले। आज होली वास्तव में हुरदंग ही बनकर रह गयी है। यह प्रेम व भावनाओं का महापर्व अब व्यसन, अशिष्टता और अशांति का सबब बनता जा रहा है। अब होली पर भांग-शराब आदि मादक पदार्थों का सेवन जैसे अपरिहार्य होता चला जा रहा है। लोग होली के दिन सुबह से ही पीना शुरू करते हैं और देर रात तक पीते रहते हैं। नशे ेमें धुत होकर सो जाना या फिर उल्टियां करके पूरे घर में बदबू फैलाकर घर की महिलाओं व बच्चों के लिए भी त्योहार का मजा किरकिरा करने से बाज नहीं आते हैं।
अब तो गांवों, कस्बों और मुहल्लों में पढऩे वाले व छोटे बच्चे भी होली के लिए चंदा इक्टठा कर शराब खरीदते हैं। आज अब कहा जाता है कि होली के दिन सब कुछ माफ रहता है। यानि अमानवीय, अमर्यादित, पशुओं व पिशाचों के समान आचरण करने की छूट होती है क्या ?
सचमुच इस दिन नशे में धुत लोगों की आंखों में वहशीपन, हैवानियत के तैरते डोरों देखा जा सकता है। तभी तो आज की होली दुश्मन को गले लगाकर दोस्त बनाने की नहीं बल्कि दुश्मनी का बदला लेने का सुनहला मौका बन जाती है। अब होली उल्लास, प्रेम, शांति की जगह अशांति और भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला पर्व बनता जा रहा है।
होली पर्व को लेकर शांति और अमन-चैन कायम करने के लिए पुलिस वालों की छुट्टियां रद्द कर और संवेदनशीन स्थानों को चिन्हित कर डियूटी लगायी जाती हैं। आखिर क्यों ? होली उमंग-उत्साह-प्रेम की जगह अशांति, कलह, तनाव और अश्लीलता का कारण बनती जा रही है। पुलिस वाले के भी परिवार होते हैं जो समाज में फैल रहे नफरत को रोकने के लिए अपने परिवार के खुशियों को त्याग कर हमारे लिए सुख शांति अमन चैन कायम करने के लिए होली दिवाली दशहरा जैसे त्यौहार पर भी अपने ड्यूटी में खड़े रखते हैं ।
आज इस पर चिंतन करने की जरूरत है कि लोग शराब व अन्य मादक पदार्थों के नशे में धुत होकर होली पर अपने आचरणों व विचारों से बच्चों और आने वाली पीढिय़ों को क्या संदेश देना चाहते हैं? सचमुच होली शराब के नशे में धुत होने और मानवीय मर्यादाओं को तार-तार करने का पर्व तो नहीं बनता चला जा रहा है। हम सबको मिलकर अपनी पुरानी संस्कृति लानी होगी हमें नफरत को त्याग कर आपसी भाईचारे के साथ त्यौहार का आनंद लेना चाहिए।
अब जरा सोचिए कोई पर्व या त्योहार व्यक्ति के जीवन को सरस और गतिशील बनाने, उसे तनावमुक्त करने के साथ ही उसमें सामाजिक और आत्मीयजनों के प्रति भी अपनी जिम्मेदारियों व संबंधों का बोध कराने के लिए होता है। तब फिर होली क्यों आज बदरंग होती चली जा रही है। निसंदेह आज लोगों को अपने प्रवृत्तियों पर गौर करना ही होगा। आज वास्तव में होली की भावनाएं तार-तार होती जा रही हैं। इस पर्व पर माद्रक द्रव्यों का सेवन व अश्लीलता आचरण काफी दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है।
होली के दौरान कुछ लोगों की क्षुद्रता व अमानवीय आचरण से बच्चों में विकृत संस्कार पैठते जा रहे हैं। अब अधिकांश लोग होली के दिन घर में शराब का सेवन कर व नशे में धुत जाते हैं। लेकिन आप ने कभी यह नहीं सोचा कि ऐसा करते भावनाओं के महापर्व होली की गरिमा व भव्यता को प्रभावित करने के साथ ही अपने मासूमों का भी जीवन को तबाह करने की आधारशिला भी रखते जा रहे हैें । बहरहाल होली पर इस तरह के क्षुद्व आचरण को कत्तई और किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं किया जा सकता है। याद रखिए यह भास्मासुरी प्रवृति है जो अंतोगत्वा सर्वप्रथम आपको ही जलाकर नष्ट कर देगी। अत: अब सोचिए, अबकी होली में मत पीजिए। अपने पर सब्र और सयंम रखिए अपने मासूमों के लिए, अपने परिवार के साथ मि़त्रों के साथ आदर्श तरीके से होली की खुशियां बांटें, मुस्कुराएं और दूसरों के भी होठों पर खिलखिलाहट फैलाएं ।
होली के परंपरागत स्वरूपों यानि जड़ों की तरफ लौटने का प्रयास करें। जिससे यत्र-त़त्र-सर्वत्र प्रेम-उमंग-उल्लास का भाव प्रस्फुटित हो, साथ ही ढोल की थापों पर अश्लीलता और फुहड़ नहीं बल्कि निकलने वाले प्रेम व आत्मीयता के रंग में सराबोर मनभावन बोल से पूरी कायनात झूम उठे।
Discover more from समाज जागरण
Subscribe to get the latest posts sent to your email.



