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छद्म पत्रकारिता ने धो डाला पत्रकारों का सम्मान–श्रीमती सरोज त्रिपाठी

समाज जागरण दैनिक
विश्व नाथ त्रिपाठी

प्रतापगढ़। आज पत्रकारों का सम्मान घटा है।उनसे कोई भी अधिकारी या सम्मानित व्यक्ति बात करना पसंद नहीं करता,इसका मूल कारण छद्म पत्रकारिता ही है क्योंकि आज पत्रकारिता की आड़ में दलालों की चांदी हो गयी है ।जिन्होंने पत्रकारिता को अपने मिशन के रूप में देखा उनका काम तो साफ सुथरा रहा लेकिन जिन्होंने धनार्जन के लिए पत्रकार बनना अपना कार्य चुना उनके लिए पैसा कमा कर भौतिक जीवन जीना ही उद्देश्य बन गया।यह बातें पत्रकारिता और समाज पर आधारित एक विचार गोष्ठी में भाजपा की महिला मोर्चा की पूर्व अध्यक्ष श्रीमती सरोज त्रिपाठी ने कही।
ऐसा नहीं है कि पत्रकारिता का यह स्वरूप अब आया है । प्रिंट मीडिया की शुरुआत में ही यह गंदे भाव मन में आने लगे थे कि अखबार जगत में भी अच्छा खासा व्यवसाय किया जा सकता है लेकिन यह भाव सब में नहीं एकाध में रहा होगा।देश की आजादी में अहं भूमिका निभाने वाला यह कार्य इतना घृणित क्यों समझा जाने लगा?
वास्तविकता तो यह है कि अखबार जगत में पैठ रखनेवाले लोग राजनीति के संकरे दरवाजे में प्रवेश करने लगे ,धीरे धीरे उनको मलाई का कटोरा दिखने लगा और उस कटोरे को चाटते चाटते वे चाटुकार कहे जाने लगे ।उन्हें सत्ता की ललक अच्छी लगी और वे राजनीतिक पार्टियों के पालतू जानवर के रूप में एक स्वामिभक्त की भूमिका में अपने को स्थापित कर। भौतिक जगत की चाहर दीवारों में ही अपना नैतिक जीवन कैद कर दिया।करते क्यों न ,गाड़ी ,बंगले,हवाई जहाज ,मंत्रियों का रौबदार संबंध और तो और अदने से कद में आकाश को समेटने की छमता का आभास भी होने लगा। चरित्रहीन नेताओं,भ्रष्टारी अधिकारियों का ढाल बन उनके संरक्षण का काम करने लगे ।
समय बीतता गया , दुनिया बदली , मीडिया भी प्रिंट से इलेक्ट्रानिक बनी। रेडियो और टीवी का युग आरम्भ हुआ। ।लोक प्रीयता की होड़ लग गयी लोग विचारों की तथ्यता को जलेबी की कला की ओर मोड़ना शुरू किया जो जितनी अच्छी जलेबी बना कर रसीली बना था लोग उसी को पसंद करने लगा हुआ यह की चाटुकार खबरची को नेता आत्मसात कर अपनी आराधना। का केंद्रबिंदु बनाने लगे चूंकी बहुत दिनों तक देश में काग्रेस का शासन रहा तो छद्म पत्रकारों के जनक होने का श्रेय भी उसी को मिलना लाजमी भी है।उनके अपने पत्रकार थे जो खबरों पर इत्र लगाने की कला में माहिर हुआ करते थे।
समय आगे बढ़ा तो अखबार का क्रेज गिरने लगा उसका स्थान फेसबुक,वाट्सप व इंस्ट्राग्रामों ने लेना शुरू किया।अब क्या था गली मुहल्ले में ख़बरनवीसों की पैदाइश मच्छरों की भांति दिन दूना रात दोगुना होने लगी।माइक लेकर वाइट लेंने पहुंच गये साहब के पास ।विना जाने समझ पूछने लगे साहब बताएं अगर कुत्ते ने काटा तो डाक्टर साहब मौके पर क्यों नहीं पहुंचे,फलागाव में बिल्लियां मर रहीं हैं आप क्या इंतजाम किया अबतक आदि । ए बेचारे जागरूक पत्रकार पांच दस रूपये के लिए ,ब्लाक ,थाने तहसील, अस्पताल आदि स्थानों पर आसानी से उपलब्ध रहते हैं।देखते ही माइक ठूंस कर पूछेंगे बाबा काहे परेशान हो,वह बताएगा और वाट्सएप पर खबर चलने लगेगी। अब तो नेता भी पत्रकार बनने लगे हैं और बहुत से पत्रकार बड़े शातिर नेता बन चुके हैं ।कुछ भी बोले,कुछ भी करे खुली छूट चाहते हैं ऐसे लोग इन पक्र कोई कारगर प्रतिबंध कोई नहीं लगा पा रहा है ।तोड़-मरोड़ कर समाज को परोसने वाले एक छद्मी न देश हित में का कर सकते हैं और समाज हित में ही।


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