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पटना में फुले फिल्म का हुआ प्रदर्शन

समाज जागरण पटना जिला संवाददाता:- वेद प्रकाश

पटना/ कभी सिनेमा कभी किताबों और कभी किस्सों में सपने देखने वाले बच्चों ने अब उन्हें थिएटर के पर्दे पर सजीव देखा।
“मिशन नौनिहाल सम्मान” के सौजन्य से पटना के सिनेपालिस थिएटर (पी एंड एम मॉल) में महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन पर आधारित प्रेरणादायक फिल्म ‘फुले’ का विशेष प्रदर्शन हुआ। यह आयोजन भोगीपुर (एकतापुरम), संपतचक क्षेत्र के दलित-महादलित और श्रमजीवी परिवारों के बच्चों, माताओं और अभिभावकों के लिए समर्पित था। इन बच्चों को पहली बार अग्रिम बुकिंग द्वारा थिएटर में फिल्म देखने और ऐतिहासिक चेतना से जुड़ने का सुनहरा अवसर मिला। इस प्रेरणादायक पहल के सूत्रधार रहे वरिष्ठ समाजसेवी सुखदेव सिंह ‘सुखदेव बाबू’ (95 वर्ष), जो “मिशन नौनिहाल सम्मान” के संस्थापक-संरक्षक, यूनिसेफ के स्थायी सहयोगी सदस्य और सर्वोच्च मानवाधिकार संरक्षण सम्मान से सम्मानित हैं। “मिशन नौनिहाल सम्मान” ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं जिलाधिकारी पटना चन्द्रशेखर सिंह से फिल्म ‘फुले’ को कर-मुक्त (टैक्स फ्री) घोषित करने तथा गरीब विद्यार्थियों को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा देने का विनम्र आग्रह किया है।
कार्यक्रम में संपतचक नगर परिषद की वार्ड संख्या 14 की पार्षद नीतू कुमारी एवं सामाजिक कार्यकर्ता विनेश पासवान ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। फिल्म के प्रदर्शन के बाद बच्चों के चेहरों पर खुशी, आत्मबोध, गर्व और प्रेरणा का अद्भुत मिश्रण दिखाई दिया। इस आयोजन में सावित्री कुमारी, मिन्ता कुमारी, तृषा कुमारी, आँचल कुमारी, सुहानी कुमारी, सुनीता देवी, राहुल कुमार पासवान, जूली कुमारी, रुबीना कुमारी, नितिल कुमार, काजल कुमारी, सुहाना कुमारी, रामदुलारी देवी, नन्दिनी कुमारी, सन्नी कुमार, रुपा कुमारी, शिल्पी कुमारी, गोलू कुमार, विशन कुमार, मोनु कुमार, गौरव कुमार सहित कई बालक-बालिकाओं एवं माताओं ने भाग लेकर इस क्षण को अविस्मरणीय बना दिया। फिल्म ‘फुले’ केवल ऐतिहासिक घटनाओं का चित्रण नहीं करती, बल्कि यह भी बताती है कि शिक्षा, समानता और नारी गरिमा के लिए संघर्ष आज भी कितना जरूरी है। यह आयोजन इस बात का प्रमाण बन गया कि परिवर्तन भाषणों से नहीं, जमीनी प्रयासों से आता है। समाजसेवी ‘सुखदेव बाबू’ के इस मानवीय प्रयास ने साबित कर दिया कि जब विचार को क्रियान्वित किया जाता है, तो समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति तक भी उम्मीद की रोशनी पहुँचाई जा सकती है।


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