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यत् गच्छति तत् न काल: जीवनम्

प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमा का बहिष्कार कर ईको फ्रेंडली प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की जाए

प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमा के अनेक दुष्परिणाम हमें भविष्य में देखने का मिलेंगे:कला शिक्षक मूर्तिकार राजेश कुमार

अररिया/डा. रूद्र किंकर वर्मा।

“यत् गच्छति तत् न काल: जीवनम् ।” जो बीत रहा है वह समय नहीं, जीवन है। शाश्वत जीवन के लिए यही सच है ।इस चराचर जीव जगत में जीवन चाहे मानव हो अथवा जलचर, उभयचर , नभचर व पेड़ पौधे सभी शामिल हैं। सभी का प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठा कर समय के साथ आगे बढ़ना उतना ही महत्वपूर्ण। आज जीव जगत के सभी प्राणियों में पर्यावरण संकट के कारण जीवन व्याधियों से दुर्गम होता जा रहा है। चाहे जल हो, वायु हो, हमारी मांटी,भोजन सभी दुषित हो रही है। इसका मूल कारक मानव का नीजी स्वार्थ और जागरूकता की कमी नहीं तो और क्या हो सकता है!
यदि मानव समाज जागरूक हो और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना बंद कर दें तो हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों सुरक्षित और सुंदर हो सकता है साथ ही अपने भावी पीढ़ी को समृद्ध जीवन जीने का वरदान मिला सकता है।
उक्त बात जवाहर नवोदय विद्यालय अररिया के कला शिक्षक मूर्तिकार राजेश कुमार ने कही। उन्होंने कहा कि जो लोग अपने जीवन काल को जीवंतता से जीते हैं, वही समाज को कुछ नया दे सकते हैं। वरन जीवन समय के साथ व्यतीत होता है। पर्यावरण के प्रति सचेतक के रूप में एक कलाकार का मन संवेदनशील तो होता ही है, परन्तु वे अपनी पीड़ा को नहीं रोक पाते, तभी जवाहर नवोदय विद्यालय अररिया वर्ष 2016 में पदस्थापित हुए और जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अररिया जल जीवन हरियाली योजना का शुभारंभ किए। तत्कालीन जिलाधिकारी बैद्यनाथ यादव के निर्देश पर राजेश कुमार ने जल जीवन हरियाली पर आधारित एक कलाकृति तैयार की ,जिसे मुख्यमंत्री को भेंट किया गया। मुख्यमंत्री को बहुत पसंद आया और पटना ले गए। उसी
अररिया कॉलेज के पास ज्ञान और प्रकाश की देवी मां सरस्वती की प्रतिमा प्लास्टर ऑफ पेरिस में तैयार करने वाले कारीगरों देख लोगों को जागरूक करते रहे हैं।
उनका कहना है प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमा ईको फ्रेंडली नहीं होती है, अर्थात इसके अनेक दुष्परिणाम हमें भविष्य में देखने का मिलेंगे।
लोग हल्की और सस्ती प्रतिमा समझ कर खरीद रहे हैं,और प्राण प्रतिष्ठा कर पूजा करते हैं फिर हिन्दू धार्मिक अनुष्ठान के अनुसार बहते जल यहां के पनार नदी में विसर्जित कर देते हैं, जहां गंगेटिक डाल्फिन पाए जाने की पुष्टि पर्यावरणविद् सूदन सहाय कर चुके हैं और अब अररिया विश्व पटल पर गंगेटिक डाल्फिन के लिए जाना जाने लगा।
ये कारीगर जो पलायन कर राजस्थान से अररिया प्रतिवर्ष आकर ऐसी अनुष्ठानिक प्रतिमा का निर्माण कर रहे हैं और नदियों को,नदी के जलीय जीवों को साथ ही तटवर्ती क्षेत्रों के मृदा को दूषित करने में लगे। इसका जिम्मेदार कौन होगा ? यह चिंता यहां के लोगों को, जिला प्रशासन को व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अवश्य करनी चाहिए। केवल पूजा से पूर्व अखबारों में इश्तहार देकर अपने दायित्व का इतिश्री समझ लेना कहां तक जायज है। हमें ऐसी अनुष्ठानिक प्रतिमा खरीदने में भी परहेज़ करना चाहिए। इसके बजाय अररिया के स्थानीय शिल्पकारों द्वारा मिट्टी,पुआल, बांस की कपाची से निर्मित ईको फ्रेंडली प्रतिमा को स्थापित करना चाहिए, इससे शिल्पकारों को प्रोत्साहन भी मिलेगा।
आते जाते अररिया कालेज के किनारे सहज ही सफेद कलर की प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियां सबने देखी होगी। किन्तु जागरूकता के अभाव में अथवा सामाजिक जिम्मेदारियों से विरत होने के कारण इसके दुष्परिणाम को नहीं समझ पाते। इसके लिए जिम्मेदारी के साथ लोगों को बताना ज़रूरी हो जाता है कि प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमा का बहिष्कार कर ईको फ्रेंडली प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की जाए।


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