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सोहागपुर में माफिया की नई चाल; मजदूरों को ‘ढाल’ बनाकर सराफा नदी का सीना छलनी कर रहे रेत तस्कर

सोहागपुर (शहडोल)। सोहागपुर थाना क्षेत्र में रेत माफिया ने अब कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए पैंतरा बदल लिया है। सराफा नदी के तटों पर मजदूरों के हाथों में फावड़े और तगाड़ी थमाकर अवैध रूप से ट्रैक्टरों को भरा जा रहा है, ताकि पकड़े जाने पर इसे “गरीब की मजदूरी” का नाम देकर कार्रवाई की धार को कुंद किया जा सके।

मजदूरों को बनाया ‘मानवीय ढाल’
सूत्रों के अनुसार, माफिया जानबूझकर स्थानीय और प्रवासी मजदूरों का उपयोग कर रहा है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:
कार्रवाई से बचाव: यदि पुलिस या खनिज विभाग की टीम पहुँचती है, तो माफिया इसे ‘छोटा-मोटा खनन’ बताकर टाल देता है। बड़ी मशीनें जब्त होने पर करोड़ों का नुकसान होता है, जबकि मजदूरों और ट्रैक्टरों के मामले में सांठगांठ करना आसान होता है।

सस्ते में काम: मशीनों की तुलना में मजदूरों से काम कराना माफिया के लिए कम खर्चीला और जोखिम मुक्त साबित हो रहा है।

ट्रैक्टरों का बेखौफ रेला
सोहागपुर के ग्रामीण रास्तों पर दिन-रात अवैध रेत से भरे ट्रैक्टर-ट्रालियों की कतारें देखी जा सकती हैं। बिना रॉयल्टी और बिना किसी वैध दस्तावेज के ये ट्रैक्टर सरेआम थाना क्षेत्र से गुजर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि प्रशासन ‘उत्खनन न होने’ का दावा करता है, जबकि नदी के भीतर मजदूरों का हुजूम और सड़कों पर दौड़ते ट्रैक्टर हकीकत बयां कर रहे हैं।

प्रशासनिक तंत्र की ‘चुप्पी’ पर सवाल
मजदूरों द्वारा मैनुअल माइनिंग (Manual Mining) के भी अपने कड़े नियम हैं, जिनका पालन यहाँ शून्य है। जब दर्जनों ट्रैक्टरों में रेत भरी जा रही हो, तो यह संभव नहीं कि स्थानीय पुलिस या राजस्व अमले को इसकी भनक न हो। यह ‘मौन’ सीधे तौर पर मिलीभगत की ओर इशारा करता है।

“क्या प्रशासन को नदी में काम कर रहे सैकड़ों मजदूर और अवैध ट्रैक्टर दिखाई नहीं देते?”
“मजदूरों के नाम पर चल रहे इस संगठित अवैध कारोबार पर पुलिस ने अब तक कितनी FIR दर्ज की हैं?”
“क्या विभाग को पता है कि मैनुअल माइनिंग के नाम पर बिना रॉयल्टी के शासन को प्रतिदिन लाखों का चूना लगाया जा रहा है?”
[16:30, 1/31/2026] Vijay Tiwari Shahdol 1: अवैध रेत उत्खन्न परिवहन करने वाले एक टाटा कंपनी के मेटाडोर (डग्गी) एवं 02 ट्रेक्टर एवं आरोपीयो के विरूध्द की गई कार्यवाही


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