चीनी युआन के मुकाबले भी फिसला रुपया, बढ़ा आयात खर्च, महंगाई और व्यापार घाटे का खतरा

नई दिल्ली। वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारतीय मुद्रा पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अब भारतीय रुपया न सिर्फ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है, बल्कि चीनी युआन के सामने भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। इस गिरावट का सीधा असर भारत के आयात बिल और घरेलू महंगाई पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

युआन के मुकाबले 8% तक कमजोर हुआ रुपया

बाजार के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 से अब तक चीनी युआन के मुकाबले भारतीय रुपया करीब 8% तक टूट चुका है। पहले जहां 1 युआन की कीमत लगभग 12.8 से 13 रुपये के बीच थी, वहीं अब यह बढ़कर करीब 14 से 14.2 रुपये तक पहुंच गई है। इससे चीन से आयात होने वाले उत्पाद भारतीय बाजार के लिए महंगे हो गए हैं।

चीन से आयात पर बढ़ा दबाव

विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये में गिरावट के चलते अब भारतीय आयातकों को चीनी सामान के लिए 8 से 10 फीसदी तक अधिक भुगतान करना पड़ रहा है। इसका सीधा असर इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर उपकरण और मशीनरी सेक्टर पर देखने को मिल सकता है, जो बड़े पैमाने पर चीन से इनपुट पर निर्भर हैं।

वित्त वर्ष 2025 में भारत ने चीन से लगभग 115 से 120 अरब डॉलर का आयात किया, जबकि निर्यात मात्र 14.5 अरब डॉलर के आसपास रहा। इस भारी असंतुलन के कारण दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है।

रुपये पर दबाव के प्रमुख कारण

विशेषज्ञ रुपये की गिरावट के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारणों को जिम्मेदार मान रहे हैं—

  • पश्चिम एशिया में तनाव और ईरान-अमेरिका टकराव के चलते कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं
  • भारत-चीन व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है
  • चीनी युआन डॉलर के मुकाबले मजबूत हुआ है, जिससे रुपया दबाव में आया है
  • विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा भारतीय बाजार से भारी निकासी हुई है

महंगाई और आयात बिल पर असर

रुपये की कमजोरी और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण भारत का आयात बिल बढ़ने की आशंका है। इससे आने वाले समय में महंगाई दर पर भी दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर स्थिति लंबी चलती है तो यह भारत की आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती है।

सरकार और RBI की रणनीति

इस स्थिति से निपटने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और केंद्र सरकार मिलकर कई उपायों पर काम कर रही हैं—

  • एनआरआई डिपॉजिट नियमों को आसान बनाने की योजना
  • विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए बॉन्ड मार्केट में सुधार
  • स्थानीय मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा देकर डॉलर और युआन पर निर्भरता कम करने की रणनीति

निष्कर्ष

वैश्विक अनिश्चितताओं और व्यापार असंतुलन के बीच रुपये पर दबाव लगातार बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में रुपये की दिशा अंतरराष्ट्रीय बाजार, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेश प्रवाह पर काफी हद तक निर्भर करेगी।

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