अमलाई कोल साइडिंग बना प्रदूषण का जहर, माफियाओं और सिस्टम की सांठगांठ से इंदिरा नगर के लोग त्रस्त*

*रेलवे माल ढुलाई के नाम पर शुरू हुई साइडिंग में खुलेआम कोयले का कारोबार, धूल-धुएं से लोगों का जीना दूभर*

*हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद भी नहीं थमा प्रदूषण, सवालों के घेरे में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिम्मेदार विभाग*

अनूपपुर और शहडोल जिले की सीमाओं को जोड़ने वाला अमलाई क्षेत्र इन दिनों कोयला कारोबार और प्रदूषण के गंभीर संकट से जूझ रहा है। अमलाई रेलवे स्टेशन के समीप संचालित कोल साइडिंग, जिसे मूल रूप से खाद्यान्न, सीमेंट, उर्वरक और अन्य मालवाहक सामग्री की ढुलाई के लिए विकसित किया गया था, आज कथित रूप से कोयला माफियाओं के कब्जे और प्रशासनिक लापरवाही का केंद्र बन चुकी है। हालत यह है कि वार्ड क्रमांक 15 इंदिरा नगर, नगर परिषद बकहो के हजारों लोग रोजाना उड़ती कोयले की धूल, प्रदूषण और बीमारियों के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि वर्ष 2008 से लगातार इस कोल साइडिंग का विरोध हो रहा है। कई बार धरना-प्रदर्शन और अनशन भी किए गए, लेकिन हर बार केवल आश्वासन मिला। समस्या जस की तस बनी रही। मामला इतना बढ़ा कि इंदिरा नगर के रहवासियों को न्याय के लिए जबलपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। स्थानीय नागरिकों द्वारा दायर याचिका में साफ तौर पर प्रदूषण, अवैध संचालन और मानकों की अनदेखी का मुद्दा उठाया गया था।


*हाईकोर्ट के निर्देशों के बावजूद नहीं सुधरी व्यवस्था*
सूत्रों के अनुसार हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए स्पष्ट निर्देश दिए थे कि यदि कोल साइडिंग संचालित की जाती है तो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा तय किए गए सभी मानकों का सख्ती से पालन अनिवार्य होगा। इसमें नियमित पानी का छिड़काव, स्प्रिंकलर सिस्टम, धूल नियंत्रण व्यवस्था, ढंके हुए परिवहन और पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय शामिल थे।
लेकिन जमीनी हकीकत आज भी न्यायालयीय निर्देशों से कोसों दूर दिखाई देती है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि साइडिंग क्षेत्र में स्थापित स्प्रिंकलर पाइपलाइन केवल दिखावे के लिए लगाई गई है। न तो नियमित पानी का छिड़काव किया जाता है और न ही कोयले की धूल को नियंत्रित करने के प्रभावी उपाय किए जा रहे हैं। परिणामस्वरूप दिनभर उड़ती धूल पूरे इंदिरा नगर क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेती है।
*“धूल से घर काले, सांस लेना मुश्किल”*
इंदिरा नगर के रहवासियों का कहना है कि सुबह होते ही कोयले से भरे वाहनों और साइडिंग में होने वाली लोडिंग-अनलोडिंग के कारण पूरा क्षेत्र धूल के गुबार में तब्दील हो जाता है। लोगों के घरों की छतें, पानी की टंकियां, कपड़े और यहां तक कि खाने-पीने की वस्तुएं तक काली धूल से भर जाती हैं।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि बच्चों और बुजुर्गों में सांस संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। कई लोगों को खांसी, एलर्जी, आंखों में जलन और दमा जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन जिम्मेदार विभागों की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
*प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर गंभीर सवाल*
पूरे मामले में सबसे ज्यादा सवाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि बोर्ड चाहता तो बिना मानकों के संचालन को तत्काल बंद कराया जा सकता था। इससे पहले क्षेत्रीय अधिकारी द्वारा क्लोजर ऑर्डर जारी किए जाने की भी चर्चा रही, लेकिन इसके बावजूद साइडिंग दोबारा संचालित होने लगी।
लोगों का आरोप है कि कोल कारोबार से जुड़े प्रभावशाली लोगों और अधिकारियों की कथित मिलीभगत के कारण कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह जाती है। यही वजह है कि वर्षों से शिकायतों के बावजूद हालात में सुधार नहीं हुआ।
*रेलवे ने कराए निर्माण, फिर भी नहीं बदली तस्वीर*
जानकारी के अनुसार विरोध और न्यायालयीन प्रक्रिया के बाद रेलवे द्वारा कोल साइडिंग क्षेत्र में कई निर्माण कार्य कराए गए थे। धूल नियंत्रण के लिए स्प्रिंकलर सिस्टम, पाइपलाइन, पानी टैंकर और अन्य व्यवस्थाएं स्थापित की गईं। लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये सभी व्यवस्थाएं केवल निरीक्षण और दस्तावेजों तक सीमित हैं।
रहवासियों का कहना है कि  हमेशा स्प्रिंकलर बंद रहते हैं। कई बार बिना किसी छिड़काव के कोयले की लोडिंग-अनलोडिंग की जाती है, जिससे पूरे इलाके में प्रदूषण फैलता है। लोगों का आरोप है कि यदि वास्तव में मानकों का पालन हो रहा होता तो क्षेत्र की स्थिति इतनी भयावह नहीं होती।
*“मालवाहक साइडिंग से कोयला हब तक”*
स्थानीय जानकार बताते हैं कि जिस साइडिंग को सामान्य माल परिवहन के उद्देश्य से बनाया गया था, वह अब कथित रूप से कोयला कारोबार का प्रमुख केंद्र बन चुकी है। यहां दिन-रात कोयले से भरे ट्रकों और रैक की आवाजाही बनी रहती है। लोगों का आरोप है कि इस कारोबार से जुड़े कुछ प्रभावशाली तत्वों ने पूरे सिस्टम को अपने प्रभाव में ले रखा है, जिसके कारण शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती।
प्रशासनिक चुप्पी बनी बड़ा सवाल
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इतने वर्षों से लगातार शिकायतों, आंदोलन, अनशन और न्यायालयीन हस्तक्षेप के बावजूद हालात क्यों नहीं बदले? यदि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सभी मानकों के पालन की अनुमति दी थी तो क्या उन मानकों की नियमित निगरानी हो रही है? यदि नहीं, तो जिम्मेदार कौन है?
*स्थानीय लोगों का कहना है कि* प्रशासनिक अधिकारी केवल कागजी कार्रवाई और निरीक्षण तक सीमित हैं। धरातल पर जनता आज भी प्रदूषण के बीच जीने को मजबूर है। लोगों ने मांग की है कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए और कोल साइडिंग संचालन की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए।
*रहवासियों की मांग*
*इंदिरा नगर के लोगों ने प्रशासन से मांग की है*
कोल साइडिंग में प्रदूषण नियंत्रण मानकों का तत्काल पालन कराया जाए
नियमित पानी का छिड़काव सुनिश्चित किया जाए
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड स्वतंत्र जांच कर रिपोर्ट सार्वजनिक करे
स्वास्थ्य शिविर लगाकर लोगों की मेडिकल जांच कराई जाए
नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर साइडिंग संचालन पर सख्त कार्रवाई की जाए
*अब प्रशासन के सामने बड़ा सवाल*
अमलाई कोल साइडिंग का मामला अब केवल प्रदूषण का नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और आम जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। वर्षों से धूल और प्रदूषण झेल रहे इंदिरा नगर के लोग अब पूछ रहे हैं कि आखिर उनकी जिंदगी की कीमत कब समझी जाएगी? क्या सिस्टम माफियाओं और कारोबारियों के दबाव में यूं ही खामोश रहेगा, या फिर कभी वास्तव में जनता को राहत मिलेगी?

Leave a Reply

🛍️ Today’s Best Deals

(Advertisement)