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सफाई या हरित अपराध? घंटाघर कोतवाली परिसर में नगर निगम द्वारा पेड़ों की कटाई पर सवाल

विशेष रिपोर्ट | रविंद्र आर्य
गाज़ियाबाद

गाज़ियाबाद के घंटाघर थाना कोतवाली परिसर में आज नगर निगम द्वारा की गई कथित “सफाई कार्रवाई” एवं सौंदर्यकरण ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों और मौके पर मौजूद लोगों के अनुसार, आज दिन में कोतवाली परिसर और आसपास के क्षेत्र में कई हरे-भरे पेड़ों को काट दिया गया, जिन्हें सफाई ओर सौंदर्यकरण के नाम पर हटाने का दावा किया जा रहा है।

कटे हुए पेड़ अब भी कोतवाली परिसर में पड़े हुए हैं, जो इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि यह कार्रवाई हालिया है और अचानक की गई है। सवाल यह है कि क्या यह केवल सफाई या सौंदर्यकरण थी, या फिर पर्यावरणीय नियमों को ताक पर रखकर किया गया हरित अपराध?

अनुमति कहां है? जवाबदेही किसकी?

पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी सार्वजनिक स्थान—विशेषकर पुलिस परिसर जैसे संवेदनशील क्षेत्र—में पेड़ों की कटाई के लिए वन विभाग, पर्यावरण विभाग और सक्षम प्राधिकरण की अनुमति अनिवार्य होती है।
अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि:

  • क्या इन पेड़ों की कटाई के लिए कोई लिखित अनुमति ली गई थी?
  • क्या वैकल्पिक वृक्षारोपण की कोई योजना तैयार की गई है?
  • क्या इस कार्रवाई की सूचना NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) या संबंधित पर्यावरणीय एजेंसियों को दी गई थी?
  • NGT की निगरानी के बावजूद चुप्पी क्यों?

हैरानी की बात यह है कि NGT की सख्त निगरानी और पर्यावरणीय दिशा-निर्देशों के बावजूद, इस पूरे मामले में अब तक कोई भी अधिकारी खुलकर जिम्मेदारी लेने या शिकायत दर्ज कराने को तैयार नहीं दिख रहा।

स्थानीय लोगों का कहना है कि वे शिकायत करना चाहते हैं, लेकिन प्रशासनिक दबाव और भय के चलते कोई आगे नहीं आ रहा।

नगर निगम और पुलिस की भूमिका पर प्रश्न

इस घटना ने नगर निगम की कार्यप्रणाली और थाना कोतवाली प्रशासन की भूमिका—दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यदि यह कार्रवाई नगर निगम ने की, तो:

पुलिस परिसर में बिना सार्वजनिक सूचना के पेड़ काटने की अनुमति किसने दी?

पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी क्यों की गई?

और यदि पुलिस प्रशासन की सहमति से यह हुआ, तो यह कानून की रक्षा करने वालों द्वारा कानून के उल्लंघन जैसा गंभीर मामला बनता है।

पर्यावरण बनाम प्रशासनिक मनमानी

आज जब एक ओर सरकारें हर स्तर पर “ग्रीन सिटी”, वृक्षारोपण अभियान और जलवायु संतुलन की बात कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर इस तरह की घटनाएं उन दावों की सच्चाई पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।

यह मामला केवल कुछ पेड़ों की कटाई का नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और कानून के समान अनुपालन का है।

मांग
पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए

जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध NGT के दिशा-निर्देशों के तहत कार्रवाई हो

कटे गए प्रत्येक पेड़ के बदले वैकल्पिक वृक्षारोपण अनिवार्य किया जाए

भविष्य में ऐसी किसी भी कार्रवाई से पहले सार्वजनिक सूचना और पर्यावरणीय स्वीकृति सुनिश्चित की जाए

अगर आज सवाल नहीं उठे, तो कल शहर सांस लेने लायक भी नहीं बचेगा।

ग्राउंड रिपोर्ट: रविंद्र आर्य


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