दीपावली और मेरा बचपन……प्रोफेसर कल्पलता पाण्डेय

कुलपति जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया

मेरी दृष्टि में दीपावली सर्वाधिक आनंद से भरा पर्व है । 5 दिनों तक पर्वों को आनंद से मनाना मुझे बचपन से ही अच्छा लगता था ।धनतेरस को शाम के समय दीपक बाहर रखने से जो उत्साह प्रारंभ होता था ।वह भाई दूज पर गोवर्धन पूजा और भाई को कूट्टी मिठाई खिलाने तक बरकरार रहता था। उस समय मोमबत्ती के स्थान पर दीपक जलाने की प्रथा थी। अतः हम बच्चे दीपक की लंबी लंबी बत्तियां बनाने में लग जाते थे कि कौन अधिक बत्तियां बना रहा है। शाम को जब अंधेरा होने लगता था तो हम लोग इस फिक्र में डूबे रहते थे कि बाकी लोगों के दीपक जल जाए तब अपने घर में दीपक जलाएं जिससे सबसे अधिक देर तक हमारे घर के दीपक जले ।

दूसरे दिन अन्नकूट में 56 प्रकार के व्यंजन बनाए जाते थे जिसमें हम सबका कार्य पकवानों की गिनती करना होता था । दीपावली के पहले छोटी दीपावली अर्थात नरक चतुर्दशी को हनुमान जयंती भी मनाई जाती थी ।मेरी नानी का जन्म दिवस भी इसी दिन पड़ता था। अतः हमारे लिए यह दुगुने उत्साह का अवसर होता था। पटाखे आदि से मैं दूर रहती थी ।मुझे अभी भी पटाखे जलाना एकदम नहीं पसंद है अभी भी दीपावली में दीपों का पर्व मन को उत्साहित करता है अभी भी पूरे उत्साह के साथ मैं दीपावली मनाती हूं ।

प्रोफेसर कल्पलता पाण्डेय

रात में भड़ेहर भी भर कर अपने भाइयों एवं संसार के सभी भाइयों की लंबी आयु की कामना करती हूँ। परंपरा से चली आ रही कहानियों को पहले सुनती थी अब सबको सुनाती हूं । रात में काजल बना कर दूसरे दिन सुबह सब लोग काजल लगाते हैं बचपन में भोर में 3:00 बजे मेरी नानी पुराना सूप लेकर उसे दरिद्र को भगाती हुई उस सूप को बजाती थी ।वह अब नहीं होती है लेकिन सुबह की कहानी सुनकर घर के सभी सदस्यों को मेरी मां अभी भी काजल लगाती है ।

इस पर्व में आनंद भरा हुआ है इसलिए दीपों के पर्व को उल्लास से मनाना चाहिए और पटाखे आदि से दूर रहकर पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखना चाहिए ।किसी भी राष्ट्र की परंपराओं को जीवंत रखना उसकी संस्कृति को जीवंत रखता है।
मैं इस पर समस्त बलिया वासियो एवं समस्त विश्व नागरिकों को ढेर सारी शुभकामनाएं देती हूं कि वह स्वस्थ रहें एवं अपने अंतरतम के दीपक को जलाकर ज्ञानवृद्धि हो और राष्ट्र को समृद्ध ज्ञान समाज की ओर ले चले।

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