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दो दिवसीय जनजातीय गौरव राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई संपन्न*

*भारत के स्वाधीनाता संग्राम में जनजातीय समाज के योगदान को समझने के लिए उनकी मौखिक परंपरा को जानना है जरूरी: डॉ संतोष कुमार सोनकर*
समाज जागरण
खैरागढ़ : जनजातीय समुदायों के इतिहास, संस्कृति और उनके योगदान से विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को परिचित करावाने के लिए इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ में दो दिवसीय जनजातीय गौरव राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न हुआ। अंग्रेजी विभाग एवं आईसीएसएसआर के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित उक्त संगोष्ठी कार्यक्रम में दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ एवं पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों से राष्ट्रीय स्तर के वक्तागण शामिल हुए जिन्होंने विभिन्न विषयों पर अपनी बातें रखी।



इस संगोष्ठी में इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वाविद्यालय अमरकंटक, मध्य प्रदेश के अंग्रेजी और विदेशी भाषा विभाग के विभागध्यक्ष डॉ संतोष कुमार सोनकर विशेष वक्ता के रूप में आमंत्रित रहे। संगोष्ठी के संयोजक डॉ कौस्तुभ रंजन ने स्मृति चिन्ह, अंगवस्त्र और संगोष्ठी की किट देकर उनका स्वागत किया। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समुदाय की भूमिका जानने के लिए इस समुदाय की मौखिक परंपराओं को समझना जरूरी है क्योंकि इतिहासकारों और अंग्रेजी विद्वानों ने जनजातीय समुदाय के गौरवशाली इतिहास को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया है। साथ ही छत्तीसगढ़ के भूमकाल आंदोलन और मध्य प्रदेश के भील आंदोलन, गोंड आंदोलन एवं जंगल सत्याग्रह पर बात रखते हुए शहीद गुंडाधुर, राजा शंकर शाह, कुंवर रघुनाथ शाह, भीमा नायक, ख़्वाजा नायक, टंट्या भील, जनजातीय जैसे अमर शहीदों के बारे विस्तृत रूप से बताया। डॉ सोनकर ने हरि राम मीणा की पुस्तक “धूणी तपे तीर” का जिक्र करते हुए मानगढ़ शहादत और गोविन्द गिरी के आंदोलन पर भी प्रकाश डाला। साथ में जामिया मिलिया इस्लामिया से पधारे डॉ सत्य प्रकाश प्रसाद और छत्तीसगढ़ के प्रोफेसर चितरंजन कर भी मंचसीन रहे और औपनिवेशिक ताकतों के विरुद्ध जनजातीय समाज का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान पर अपने विचार साझा किये।

जनजातीय विश्वविद्यालय के अंग्रेजी और विदेशी भाषा विभाग के शोधार्थी शुश्रुत रंजन पटनायक और रविन्द्र कुमार साकेत ने भी अपने शोध पत्रों का वाचन किया।

दो दिवसीय जनजातीय गौरव राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में प्रो.डॉ. मनीष श्रीवास्तव अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विभाग गुरू घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता माननीय कुलपति महोदया प्रो.(डॉ.) लवली शर्मा ने की।

*संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य*

इस संगोष्ठी का उद्देश्य जनजातीय समुदायों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और उनके अधिकारों की रक्षा करना है, जिसमें –

1. *जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा*: संगोष्ठी का उद्देश्य जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा करना और उनके हितों को बढ़ावा देना है।
2. *संस्कृति और इतिहास का संरक्षण*: संगोष्ठी में जनजातीय समुदायों की संस्कृति और इतिहास को संरक्षित करने के तरीकों पर चर्चा की गई।
3. *जागरूकता बढ़ाना*: संगोष्ठी का उद्देश्य जनजातीय समुदायों के प्रतिf जागरूकता बढ़ाना और उनके योगदान को याद करना रहा है।

दो दिवसीय संगोष्ठी का लाभ उठाने विश्वविद्यालय के अधिष्ठातागण, विभाग अध्यक्षगण, विभाग प्रमुखगण, प्राध्यापकगण, अतिथि व्याख्यातागण, संगीतकारगण सहित विद्यार्थी एवं शोधार्थीगण उपस्थित रहे।

संगोष्ठी का समापन संयोजक डॉ कौस्तुभ रंजन, सहायक प्राध्यापक के द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।


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