खतरनाक नदी पार कर स्कूल जाने को मजबूर आदिवासी बच्चे, साधन से शिकायत के बाद भी हादसे के इंतजार में प्रशासन?
सीधी। आजादी के 77 साल बाद भी अगर जिला मुख्यालय से महज 12 किलोमीटर दूर रहने वाले बच्चों को स्कूल जाने के लिए उफनती और खतरनाक नदी पार करनी पड़े, तो इसे विकास कहा जाए या सरकारी योजनाओं की हकीकत?
सीधी मुख्यालय से करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित कठौली मोर्चा ग्राम की एक बस्ती में रहने वाले आदिवासी परिवारों के बच्चों की तस्वीरें शासन-प्रशासन के विकास के दावों पर सवाल खड़े कर रही हैं। स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चे जान जोखिम में डालकर नदी पार करने को मजबूर हैं।
ठेकेदार ने पुल उखाड़ा, रास्ते का काम अधर में
बस्ती के रहने वाले भोले सिंह ने बताया कि गांव तक पहुंचने वाले मार्ग पर नदी के ऊपर पुल एवं सड़क निर्माण का काम ठेकेदार द्वारा शुरू किया गया था। लेकिन पिछले दो-तीन महीनों से निर्माण कार्य बंद पड़ा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि नदी पर लगाया गया अस्थायी पुल भी ठेकेदार द्वारा उखाड़कर वहां से हटा दिया गया। इसके बाद ग्रामीणों के सामने नदी पार करने का कोई सुरक्षित रास्ता नहीं बचा। जिसकी शिकायत जिला मुख्यालय में कलेक्टर साहब को भी की गई लेकिन उनके आदेश का भी पालन होता दिखाई नहीं पड़ रहा है नदी में पानी का बहाव बहुत तेज है यदि किसी का पैर पानी में अचानक फिसलता है तो दर्दनाक हादसा निश्चित है।
ग्रामीणों ने नदी के ऊपर रखा हुआ है पेड़ की बल्ली
पिछले महीने से बरस रहे पानी से यहां के ग्रामीण किसी दूसरे जगह नहीं जा पा रहे हैं जरूरत के समान के लिए तरस रहे हैं एवं जिससे तैराकी बनती है वही नदी को क्रॉस करके शहर की ओर जाता है और जरूरतमंदों के सामान लेकर आता है नदी को क्रॉस करने वाले जमाहिर बैगा हमारे संवाददाता से बताया कि नदी पहाड़ी है और पानी का बहाव बहुत तेज रहता है नदी पार करने में दुर्घटना की संभावना बढ़ गई है और फिर भी जरूरत के सामान लाना भी मजबूरी है और उसे लाकर गांव वालों को देना भी है तो मजबूरी में हम ग्रामीणों ने लकड़ियां रखकर नदी के ऊपर अपने स्तर का रास्ता बनाया है। इसी लकड़ी के सहारे बड़े ही नहीं, बल्कि छोटे-छोटे स्कूली बच्चे भी रोज नदी पार कर स्कूल जाने को मजबूर हैं।
जरा सोचिए, बारिश के मौसम में फिसलन भरी लकड़ियों पर पैर रखते हुए अगर किसी बच्चे का संतुलन बिगड़ गया तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
- हादसा होने का इंतजार कर रहा प्रशासन?
- सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मामला जिला मुख्यालय से महज 12 किलोमीटर की दूरी का है, तो जिम्मेदार अधिकारियों की नजर इस समस्या पर अब तक क्यों नहीं पड़ी?
क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?
क्या किसी बच्चे के नदी में बह जाने के बाद ही जिम्मेदारों की नींद खुलेगी?
आदिवासी परिवारों के लिए शासन की योजनाएं आखिर किस काम की हैं, जब उनके बच्चे आज भी स्कूल जाने के लिए जान जोखिम में डालकर नदी पार करने को मजबूर हैं? जिम्मेदारों पर कार्रवाई और सड़क-पुल का काम तत्काल पूरा करने की मांग
ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से लिखित में आवेदन देकर मांग की है कि मौके का तत्काल निरीक्षण कराया जाए, निर्माण कार्य बंद होने के कारणों की जांच की जाए और संबंधित ठेकेदार को सड़क एवं पुल का निर्माण जल्द पूरा करने के निर्देश दिए जाएं।
क्योंकि विकास सिर्फ कागजों पर नहीं, जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
आज बच्चे लकड़ी के सहारे नदी पार कर रहे हैं।
कल अगर कोई हादसा हुआ तो जिम्मेदारी किसकी होगी—ठेकेदार की, विभाग की या उस प्रशासन की जो सब कुछ जानते हुए भी चुप बैठा है?
Discover more from समाज जागरण
Subscribe to get the latest posts sent to your email.



