दैनिक समाज जागरण 30.10.2026 चांद कुमार लायेक (ब्यूरो चीफ) पूर्वी सिंहभूम जमशेदपुर
सोना देवी विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय सेमिनार में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता पर हुआ मंथन, विधायक सरयू राय ने ज्ञान, दर्शन, विज्ञान और आधुनिक चुनौतियों के बीच संबंधों को किया रेखांकित
घाटशिला। सोना देवी विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में भारतीय ज्ञान प्रणाली की ऐतिहासिक विरासत, समकालीन वैश्विक परिदृश्य में उसकी प्रासंगिकता तथा उच्च शिक्षा में उसके समावेश को लेकर महत्वपूर्ण अकादमिक विमर्श हुआ। सेमिनार में शिक्षाविदों, जनप्रतिनिधियों और विषय विशेषज्ञों ने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, अनुसंधान और नवाचार से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रभाकर सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा में स्थान मिलना एक महत्वपूर्ण पहल है। भारत प्राचीन काल से ही ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और संस्कृति की समृद्ध परंपरा वाला देश रहा है। ऐसे में भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनः शैक्षणिक विमर्श के केंद्र में लाना समय की आवश्यकता है।
कुलाधिपति प्रभाकर सिंह ने औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय सभ्यता, संस्कृति और पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था पर पड़े प्रभावों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान की समृद्ध विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। उन्होंने विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षण संस्थानों में भारतीय ज्ञान प्रणाली को शामिल किए जाने की पहल का स्वागत किया और इसके लिए प्रधानमंत्री के प्रयासों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विश्वास जताया कि स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने तक विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में भारतीय ज्ञान प्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने झारखंड के विकास और समृद्धि के संकल्प को भी रेखांकित किया। अपने काव्यात्मक विचारों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक चेतना, रचनात्मकता और विचारों की स्वतंत्रता का संदेश दिया।
कोल्हान विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. रागिनी भूषण ने भारतीय ज्ञान परंपरा और वर्तमान समय की समस्याओं के बीच गहरे संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वेदों एवं उपनिषदों में ज्ञान का व्यापक भंडार मौजूद है। इन प्राचीन ग्रंथों का गंभीर अध्ययन वर्तमान समाज को अनेक जटिल समस्याओं के समाधान के लिए नई दृष्टि प्रदान कर सकता है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल अतीत की धरोहर मानने के बजाय वर्तमान जीवन और सामाजिक चुनौतियों से जोड़कर देखने की आवश्यकता बताई।
जमशेदपुर पश्चिम के विधायक एवं झारखंड विधानसभा की प्रत्यायुक्त विधान समिति के अध्यक्ष सरयू राय ने अपने विस्तृत संबोधन में भारतीय ज्ञान प्रणाली को समझने के लिए संश्लेषण और विश्लेषण के अंतर को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को सही रूप में समझने के लिए उसके मूल विचारों, दर्शन और व्यापक संदर्भों का अध्ययन जरूरी है। उन्होंने भारतीय दर्शन में वर्णित 84 लाख योनियों की अवधारणा, आदि शंकराचार्य के दर्शन, शून्य की खोज और भारतीय तथा वैश्विक ज्ञान परंपराओं के आपसी संबंधों पर विस्तार से विचार रखे।
सरयू राय ने स्वामी विवेकानंद के विचारों, रामायण और महाभारत के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए भारतीय ग्रंथों में निहित जीवन-दर्शन, ऊर्जा, तकनीकी ज्ञान और नैतिक मूल्यों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित रखने के साथ-साथ आधुनिक समस्याओं के समाधान में उसका व्यावहारिक उपयोग भी किया जाना चाहिए। भारतीय ज्ञान परंपरा में ऐसे अनेक विचार और सिद्धांत मौजूद हैं, जो आज भी मानव जीवन को दिशा देने में सक्षम हैं।
उन्होंने ज्ञान और बाजार के बीच बदलते संबंधों पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि ज्ञान का उद्देश्य केवल व्यावसायिक लाभ अर्जित करना नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका मूल लक्ष्य समाज का कल्याण और मानवीय मूल्यों का विकास होना चाहिए। उन्होंने तुलसीदास सहित भारतीय साहित्यिक और आध्यात्मिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए ज्ञान को जीवन और समाज से जोड़ने पर जोर दिया।
शोध और अकादमिक संवाद को मिला नया आयाम
सेमिनार के दौरान सभी वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान, तकनीक, अनुसंधान और नवाचार के साथ जोड़कर शिक्षा के क्षेत्र में नई संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। वक्ताओं ने कहा कि प्राचीन भारतीय ज्ञान और दर्शन का व्यवस्थित अध्ययन विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत समझने के साथ-साथ वैश्विक चुनौतियों का समाधान खोजने में भी मददगार साबित हो सकता है।
दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार ने शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को ज्ञान, संस्कृति, शिक्षा, विज्ञान तथा वैश्विक परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचारों के आदान-प्रदान का अवसर प्रदान किया। इसके माध्यम से भारतीय ज्ञान प्रणाली और समकालीन वैश्विक चिंतन के बीच अकादमिक संवाद को मजबूत करने का प्रयास किया गया।
कार्यक्रम के अंत में मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान संकाय की डीन डॉ. कंचन सिन्हा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इसके बाद राष्ट्रीय गीत एवं राष्ट्रगान के साथ उद्घाटन सत्र का समापन हुआ। कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों, आयोजकों और प्रतिभागियों ने समूह छायाचित्र लिया।
सोना देवी विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित यह राष्ट्रीय सेमिनार भारतीय ज्ञान प्रणाली की वर्तमान समय में उपयोगिता को सामने लाने, शोध एवं नवाचार को प्रोत्साहित करने तथा उच्च शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यापक अकादमिक मंच प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ।
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