लहरपुर क्षेत्र कुछ अवैध आरा मशीन भी चल रही
समाज जागरण
शिवम अवस्थी
लहरपुर(सीतापुर)-भारत सरकार ने 1981 में वायु प्रदूषण एवं नियंत्रण अधिनियम बनाया, इससे पहले 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा स्टॉकहोम में पर्यावरण सम्मेलन किया गया था, जिसमें भारत ने भाग लिया था। इसका मुख्य उद्देश्य था प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए समुचित कदम उठाना और वायु की गुणवत्ता में सुधार और वायु प्रदूषण नियंत्रण करना। इस अधिनियम द्वारा मोटर गाड़ियों और अन्य कारखानों से निकलने वाले धुएं को नियंत्रित किया जाता है। 1987 में इस अधिनियम में ध्वनि प्रदूषण को भी जोड़ दिया गया। एक केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बनाया गया और इसे राज्य बोर्डों के काम में तालमेल बिठाने का अधिकार दिया गया। इसे अधिकार दिया कि किसी क्षेत्र विशेष को यह प्रदूषण नियंत्रित क्षेत्र घोषित कर सकता है। स्वीकृत इंधन के अलावा प्रदूषण फैलाने वाले इंधन पर रोक लगाने का अधिकार भी दिया गया।
जब भी न्यायालय का ध्यान जाता है तो वह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 (क) पर ध्यान केंद्रित करता है, जिसमें पर्यावरण के संरक्षण, उसमें सुधार और वन्यजीवों की रक्षा करने के लिए राज्यों को निर्देश हैं। दूसरा मूल कर्तव्यों के अध्याय में अनुच्छेद 51 (घ) के अनुसार प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा हम सभी का कर्तव्य है। इसे ध्यान में रखकर पर्यावरण संबंधी फैसला न्यायालय करते हैं।
एमसी मेहता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि वाहनों के कारण दिल्ली में अत्यधिक वायु प्रदूषण होता था जिससे मनुष्य के जीवन के अधिकार का भी हनन होता है।
तो अब सवाल यह उठता है कि लहरपुर नगर में बस्ती के बीचों बीच लगी प्लाईवुड फ़ैक्ट्रियां जब जहर उगल रही है तो इन फैक्ट्रियों पर कार्यवाही क्यों नही की जा रही है।
इन सभी नगर में स्थित कारखानों का विस्थापन नगर के बाह्य क्षेत्र में आखिर कब किया जाएगा?
तंबौर क्षेत्र में नगर व छतांगुर रोड पर स्थित फैक्ट्रियो से समूचा तंबौर भी जानलेवा बीमारी की जद में आ रहा है और लोग अपनी जान बचाने के लिए अस्पतालों में शरणार्थी बनने को विवश है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन प्रदूषणकारी कारकों पर शाशन व प्रशासन कार्यवाही क्यों नही कर रहा है।
