वीरेंद्र चौहान, समाज जागरण ब्यूरो किशनगंज।
एक ओर सरकार “डिजिटल इंडिया” और विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं जिले के टेढ़ागाछ प्रखंड अंतर्गत चिल्हनियां पंचायत की जमीनी हकीकत इन दावों को आईना दिखा रही है। सुहिया रेतुआ नदी पर आज भी ग्रामीण बांस-बल्लियों से बने अस्थायी चचरी पुल के सहारे आवागमन करने को मजबूर हैं।
यह जर्जर पुल ही आसपास के कई गांवों के लोगों के लिए मुख्य संपर्क मार्ग बना हुआ है। स्कूली बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और किसान प्रतिदिन अपनी जान जोखिम में डालकर इसी पुल से नदी पार करते हैं। स्थिति इतनी चिंताजनक है कि टोटो और साइकिल सवार भी किसी तरह संतुलन बनाकर इस अस्थायी पुल से गुजरते हैं।
बरसात के दिनों में हालात और भी भयावह हो जाते हैं। नदी का जलस्तर बढ़ते ही चचरी पुल के बह जाने का खतरा बना रहता है, जिससे गांव का संपर्क प्रखंड मुख्यालय से लगभग टूट जाता है। इसका सीधा असर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और दैनिक जरूरतों पर पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से पक्का पुल निर्माण की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई। जनप्रतिनिधियों और प्रशासन को कई बार अवगत कराने के बावजूद समस्या जस की तस बनी हुई है।
स्थानीय लोगों में इस उपेक्षा को लेकर गहरा आक्रोश है। उनका कहना है कि यदि जल्द स्थायी पुल का निर्माण नहीं कराया गया तो वे आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
विकास के दावों के बीच सुहिया रेतुआ नदी पर चचरी पुल के सहारे गुजरती जिंदगी आज भी बुनियादी सुविधाओं की हकीकत बयां कर रही है।



