
व्यक्तित्व, समाज या राष्ट्र के विकास में , शिक्षा, शिक्षा का स्तर, उपलब्धता,सर्वाधिक महत्व रखती है |
शिक्षा के क्षेत्र में बिहार का नालंदा एवं तक्षशिला शिक्षा संस्थान के रूप में भले हीं गौरवशाली ऐतिहासिक अतीत रहा हो लेकिन,वर्तमान में इस राज्य की शैक्षणिक व्यवस्था को, वोट की जातिवादी राजनीति ने मृत्यु शय्या पर ला खड़ा किया है | शिक्षण कार्य,योग्यता एवं समर्पण की स्थिति है जिसका बिहार में वितरहीत शिक्षा नीति, अध्यापन के क्षेत्र में जातिगत आरक्षणऔर फिर 2004-2005 के पश्चात सरकारी शिक्षक बहाली की नियोजन प्रणाली में भ्रस्टाचार, घुसखोरी,वोट की राजनीति ने बंटाधार कर दिया है |परिणाम बड़ा भयंकर दिख रहा| आज प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में बच्चे मिड डे मील एवं अन्य सरकारी सुविधाओं के लालच में जाते भी हैं लेकिन हाई स्कूल, इंटर कालेज, एवं डिग्री काॅलेजों में तो बस एडमिशन एवं फार्म भरने तक हीं मतलब रह गया है |पुरे बिहार में लगभग 95% संस्थानों की यही सच्चाई है |
बिहार के बीएससी पास बच्चों से पुछकर देखिये- क्या कभी प्रैक्टिकल किये हो! उत्तर नाकारात्मक मिलेगा लेकिन प्राप्त प्राप्तांक 80% से उपर | ये सब परीक्षा में खुली छूट का प्रसाद है |
सभी बुद्धिजीवी स्वीकार करेंगे एक योग्य शिक्षक हेतु उसकी योग्यता और अध्यापन के प्रति पूर्ण समर्पण आवश्यक होता है लेकिन जब शिक्षक के पास उचित योग्यता न हो और यदि योग्य हो भी और स्वयं और अपने परिवार की आर्थिक आवश्यकता की पूर्ति में तनाव की स्थिति में रहता हो तो ऐसी स्थितियों में आप वैसे शिक्षकों से क्या अपेक्षा करेंगे ❓
वितरहीत शिक्षा नीति के तहत् बिहार में सैकड़ों की संख्या में हाई स्कूल, इंटर कॉलेज और डिग्री कालेज खोले गये | इस व्यवस्था के कारण बिहार में शैक्षणिक संस्थानों की कमी किसी हद तक पुरी की गयी| प्रबंधन ने योग्य शिक्षक और कर्मचारियों को रखा भी लेकिन संबंधित संस्थाओं के प्रबंधन समितियों द्वारा नीजी स्वार्थ के मद्देनजर शिक्षक और कर्मचारियों का शोषण होता रहा | प्रबंधन मालामाल होता रहा और शिक्षक तथा कर्मचारी रोटी के मुहंताज बने रहे | सरकार ने 2007-2008 से पास हुए छात्रों के आधार पर अनुदान देने की व्यवस्था की जो न्यूनतम सहयोग तो है हीं उसमें भी संबंधित प्रबंधकों द्वारा घपला करने की होड़ लगी रही है | अनुदान किसे मिलना चाहिए और कैसे बटवारा होना चाहिए! इसका सरकार द्वारा तय मानकों और कायदे- कानूनों का खुल्लमखुल्ला उलंघन होता आया है और हो रहा है जैसे इंटर काउंसिल, और डिग्री काॅलेजों के लिये सरकार के निर्देशानुसार 2007-2008 के बाद के नियुक्त शिक्षक या शिक्षकेत्तर कर्मचारी अनुदान लेने की योग्यता नहीं रखते लेकिन बाद के नियुक्त प्रबंधन से जुड़े लोगों के चहेतों को अनुदान की राशि का भुगतान किया जाता है |यही स्थिति वितरहीत सभी संस्थाओं का है चाहे हाईस्कूल हो या डिग्री कालेज | सरकार की कोई एजेंसीयां इसपर ध्यान नहीं देती क्योंकि वोट की राजनीति का सवाल है❓
*आइये नियोजन प्रणाली की भी चर्चा कर लें* —
नियोजन प्रणाली के तहत् पंचायत, प्रखण्ड एवं जिला स्तर पर शिक्षकों का चयन किया गया |चयन करने का अधिकार संबंधित प्रमुखों को दिया गया जिसमें अंकों को मेरिट का आधार बनाया गया | नियुक्ति के क्रम में नकली प्रमाण पत्रों और घूसखोरी चरम पर रही |अगर इमानदारी से गहन छानबीन हो तो 80-90 प्रतिशत गलत नियुक्ति हुई है जो अब साबित करना संभव नहीं क्यों की नियुक्तियों का रोस्टर गायब कर दिया गया है और सरकार जब प्रमाण पत्र अपलोड करने को बोली तो नकली की जगह कम प्राप्त अंकों वाला असली प्रमाण पत्र लोड कर दिया गया | कहा गया कि इसी मेरिट पर चयन हुआ था😄😄😄 |
ततकालीन नियोजित शिक्षकों में बहुतों को चपरासी का भी ज्ञान नहीं लेकिन…. धन्य है सरकारी नीति 😩😩😩|
हाँ जबसे *टीईटी*उतीर्ण शिक्षकों की बहाली शुरू हुई, निश्चय हीं योग्य शिक्षक बिहार को मिले लेकिन यहाँ फिर आर्थिक शोषण की सरकारी प्रवृत्ति योग्यता को बाधित करने लगी | बिहार में योग्य शिक्षकों को दिया जाने वाला वेतन और अन्य इनके आर्थिक भविष्य की सुरक्षा की स्थिति हमें सैकड़ों बर्ष पहले की जमिंदारी बधुआ मजदूरी की इतिहासिक स्थिति का परिचय दिलाती है | जैसे हाल हीं में टीईटी पास शिक्षकों की बहाली हुई उनका वेतन लगभग 20000/=, उसी तरह हाल हीं में एसटेट पास हुए 3523 शारीरिक शिक्षकों में 2258 शिक्षकों ने हीं योगदान किया क्योंकि वेतन 8000/= प्रति माह🥱🥱|
अब आप सोचिये- जिनके कंधों पर हम अपने समाज, राष्ट्र को योग्य एवं स्वस्थ नागरिक पैदा करने की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेवारी सौंपे हैं वे ऐसी मजदूरी में क्या किराया देंगे ❓क्या खायेंगे और अपने परिवार का उचित पालन पोषण करेंगे❓ जैसा कि मैंने पूर्व में कहा- एक समर्पित शिक्षक के लिए आर्थिक कठिनाईयां उसे इमानदारी से कर्तव्य निर्वहन में बाधक होतीं हैं तो ऐसी स्थिति में हम क्या आशा रखें ⁉️घर से दूर रहकर एक शारीरिक शिक्षक जिसकी आमदनी 8000/= होगी वो और उसका परिवार कैसे जीयेगा ❓(जबकि केंद्रीय वेतनमान के अनुसार बीपीएड धारी शारीरिक शिक्षकों का आरम्भिक वेतन 55000-60000/= के बीच होना चाहिए) | वैसे भी ये शिक्षक *एस टेट*उतीर्ण हैं अर्थात कुशल मजदूर की श्रेणी में आते़ंं हैं और एक कुशल मजदूर की न्यूनतम मजदूरी बिहार सरकार के तहत् 10660/= रुपये है| फिर क्यों बिहार में योग्य एवं स्वस्थ्य नागरिक पैदा करने की जिम्मेवारी रखने वालों को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं!!! ये कैसा न्याय है❓अब आप ही कहिये! क्या अपेक्षा की जाय❓जबकि एक एमएलए और मंत्री लाखों का वेतन, भत्ता के साथ साथ आजीवन तीन- चार पेंशन लेने के अधिकारी ‼️धन्य है बिहार सरकार और उसकी नीति ‼️
मान लिजीए सरकार कहती है कि कोई दुसरा धंधा भी कर ले तो दिन का प्रथम
चार घंटा स्कूल में देना होता है तो वो उसके बाद कौन सी मजदूरी एक शारीरिक शिक्षक को मिलेगा❓सरकार न हो तो मनरेगा, नरेगा में रजिस्ट्रेशन हीं करवा दे😫😫|
बिहार सरकार की ऐसी बधुआ मजदूर बहाल करने की हीं नीतियों का परिणाम है कि पुरे बिहार में स्कूलों में और कालेजों में, क्लास करने वाले छात्र- छात्राओं की संख्या नगण्य हो चली है |बच्चें कोचिंग जातें हैं लेकिन सरकारी स्कूल, कालेजों में सिर्फ नामांकन और परीक्षा फार्म भरने का काम होता है |कहते हैं कि देखो! बिहारी, अपनी प्रतिभा का लोहा पुरे देश में साबित करता है!! ठीक है साबित करता है लेकिन उसमें कितने बिहार प्रोडक्ट होतें हैं ⁉️आज वही बच्चे- बच्चियाँ सफल हो रहे जो हैं तो बिहार के मूल निवासी हैं लेकिन शिक्षा- दिक्षा बिहार के बाहर किये हैं या कर रहे हैं 🥱🥱🥱|
असल में बिहार का राजनीतिक परिवेश ऐसा बन चूका है कि कोई पार्टी शिक्षा एवं शिक्षकों का भला चाहतीं हीं नहीं! क्योंकि बिहार में सत्ता का मापदंड “जातिवाद” है और राजनीतिक पार्टियां शैक्षणिक विकास चाहेगीं भी नहीं क्योंकि यदि बिहारवासी शिक्षित हो जायेंगे तो योग्यता के आधार पर एमपी, एमएलए का चुनाव करने लगेंगे!!!भ्रष्टाचारियों को मौका नहीं मिलेगा जबकि वर्तमान में चारा घोटाले के आरोपी का बेटा बिहार का उपमुख्यमंत्री है!!! जनता मूर्ख बनी रहे यही बिहार की राजनीति है चाहे नितीश कुमार हों या लालू यादव या कोई और राजनीतिक दल |
भारत सरकार से अनुरोध है कि बिहार की शैक्षणिक व्यवस्था पर ध्यान दे और इसे दानवी घेरे से मूक्त करे |
शुभम् शुभम्,
— प्रोफेसर राजेन्द्र पाठक
(समाजशास्त्री)
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