google-site-verification: google2b21991adbe5cec3.html

जन्नत के दरवाज़े पर सब्र की दस्तक़ है:रोज़ा सोहैल असरार खान

समाज जागरण/प्रवेश यादव

पबांसा /माह -ए- रमज़ान खुशबुओं का खज़ाना है। रमज़ान का महीना रहमतों और बरकतों का महीना है।माह-ए-रमज़ान में रोज़ा रखना अच्छी ज़िन्दगी जीने की तरबियत है ।इसमें इबादत कर परवरदिगार की राह पर चलने वाले इन्सान का ज़मीर रोजेदार को एक नेक इन्सान के किरदार के लिए हर ज़रूरी तरबियत देता है।यह विचार मुंबई के प्रसिद्ध समाजसेवी ने प्रेस वार्ता के दौरान दैनिक समाचार पत्र समाज जागरण से अपने संबोधन में व्यक्त किए।


सोहैल असरार खान ने कहा कि रमज़ान का तीसरा और आख़िरी अशरा 21वें रोज़े से शुरू होकर 29वें या 30वें रोज़े तक चलता है।तीसरे अशरे का उद्देश्य दोज़ख से निजात पाना है।यक़ीनन रोज़े की 27वीं रात ही शब-ए-कद्र यानी इज्जत और अजमत वाली रात है।माह ए रमज़ान में शब ए कद्र ऐसी ही ख़ास और मुकद्दस रात है।जिसमें मज़हब ए इस्लाम की पाकीज़ा किताब कुरआन ए पाक तमाम दुनिया और इंसानियत के लिए रहनुमाई , रोनक़ और रहमत की रोशनी तो है ही समाजी जिंदगी का पाकीज़ा आईना भी है।तीसवें पारे की सूरह कद्र कद्र की पहली आयत में जिक्र है कि मज़हब ए इस्लाम की सबसे बड़ी इस्लामी किताब कुरआन ए पाक को शब ए कद्र में नाजिल किया गया शब-ए-कद्र में इबादत का शबाब हज़ार महीनों से ज्यादा बेहतर है।


Discover more from समाज जागरण

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

🛍️ Today’s Best Deals

(Advertisement)