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कोशी अंचल के गौरव: प्रो. सुरेश मंडल

जैसे सागर को अंजलि में और सूर्य की विभा को डिब्बे में बंद करना असंभव है, वैसे ही किसी महान व्यक्तित्व का सम्पूर्ण वर्णन करना भी कठिन है। ऐसे ही अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी हैं पूर्णियाँ विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित प्राध्यापक, प्रोफेसर सुरेश मंडल, जो न केवल शिक्षा के क्षेत्र में, बल्कि साहित्य के आकाश में भी अनमोल रत्न हैं। उनका जीवन और कार्य, विशेषकर उनके विद्यार्थियों के लिए, एक प्रेरणा और आदर्श का स्रोत है।

प्रोफेसर सुरेश मंडल का व्यक्तित्व ज्ञान और मानवता का उत्कृष्ट संगम है। उनके प्रति श्रद्धा का जो आकाश मेरे हृदय में फैला हुआ है, उसे शब्दों में बांधने का प्रयास करना यद्यपि एक कठिन कार्य है, फिर भी मैं अपने प्रिय गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा का कुछ अंश प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

साहित्यिक योगदान: प्रोफेसर मंडल न केवल एक विद्वान शिक्षक हैं, बल्कि वे एक श्रेष्ठ साहित्यकार भी हैं। उनकी मौलिक कृतियाँ साहित्यिक दुनिया में मील के पत्थर की तरह स्थिर हैं। उनके काव्य-संग्रहों में “पायल प्रीत की”, “तृषित हृदय”, और “स्मृति-किरण” जैसे काव्य-संग्रह उनकी गहरी सोच और सशक्त लेखन का प्रमाण हैं। इसके अतिरिक्त, उनकी सह-रचित काव्य-संग्रहों ने भी साहित्य जगत में एक नया आयाम स्थापित किया है, जैसे “संवेदना”, “मौन करुणा”, और “ममता मयी माँ”।

सम्मान और सम्माननाएं: प्रोफेसर सुरेश मंडल को उनके साहित्यिक योगदान के लिए असंख्य सम्मान प्राप्त हुए हैं। इनमें “सर्वश्रेष्ठ राजश्री सम्मान”, “दोहा वाचस्पति”, “राज श्री साहित्य सरस्वती सम्मान”, “काव्य सुधा सम्मान”, और “काव्य सुरभि सम्मान” जैसे प्रमुख सम्मान शामिल हैं। इन सम्माननों ने उनके उत्कृष्ट लेखन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है और उनके साहित्यिक योगदान को सम्मानित किया है।

मानवीय गुण: प्रोफेसर मंडल के व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण पहलू उनका मानवीय दृष्टिकोण है। वे न केवल एक शिक्षक के रूप में, बल्कि एक मार्गदर्शक और संरक्षक के रूप में भी विद्यार्थियों के साथ खड़े रहते हैं। उनका जीवन अनुशासन, समर्पण, और सच्चाई से भरा हुआ है। उनकी रचनाएँ समाज और व्यक्ति के भावनाओं की सहज और सरल अभिव्यक्ति होती हैं, जो जीवन के हर पहलू को रचनात्मक दृष्टिकोण से दर्शाती हैं।

समाप्ति में: प्रोफेसर सुरेश मंडल के समर्पण, विद्वता, और साहित्यिक योगदान ने उन्हें कोशी अंचल का गौरव बना दिया है। उनके साहित्य और शिक्षण ने न केवल विद्यार्थियों को बल्कि समग्र समाज को भी प्रेरित किया है। उनके आदर्श और मार्गदर्शन से कई जीवन संवर चुके हैं।

आखिरकार, जैसा कि एक पंक्ति में कहा गया है:
“जिसने जीवन में गुरु की अहमियत को जानी, वह हो जाता है दुनिया में नामी।”

— सौरभ कुमार
पूर्व छात्र, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, पूर्णियाँ विश्वविद्यालय, पूर्णियाँ


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