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सहयोग सेल पर सवाल: जनसुनवाई जिला कार्यालय में या जनता के द्वार?

बिजुरी से 55, पसान से 35, कोतमा से 40, राजेंद्रग्राम से 70 और अमरकंटक से करीब 100 किलोमीटर दूर है जिला मुख्यालय

जमुना कोतमा अनूपपुर भाजपा जिला संगठन द्वारा जनता एवं कार्यकर्ताओं की समस्याओं के त्वरित निराकरण के लिए शुरू किए गए सहयोग सेल को लेकर जहां संगठन इसे जनहित की पहल बता रहा है, वहीं अब इसकी कार्यप्रणाली को लेकर एक अहम सवाल भी खड़ा हो गया है—क्या वास्तव में दूर-दराज की जनता अपनी समस्याएं लेकर जिला मुख्यालय अनूपपुर तक पहुंच पाएगी?

मंगलवार, 1 सितंबर 2026 को भाजपा जिला कार्यालय अनूपपुर में सहयोग सेल की शुरुआत मध्यप्रदेश अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष एवं कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त रामलाल रौतेल, नगर पालिका परिषद कोतमा अध्यक्ष अजय सराफ एवं भाजपा जिला उपाध्यक्ष जितेंद्र भट्ट की मौजूदगी में हुई। इस दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य, राजस्व सहित विभिन्न विभागों से जुड़ी समस्याएं सुनी गईं तथा उनके निराकरण के लिए संबंधित अधिकारियों से दूरभाष पर चर्चा भी की गई।

भाजपा संगठन ने निर्णय लिया है कि सहयोग सेल में प्राप्त शिकायतों के समाधान के लिए संबंधित विभागों को भाजपा कार्यालय से पत्राचार किया जाएगा और कार्रवाई की जानकारी भी मांगी जाएगी। उद्देश्य निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन जनता तक इस व्यवस्था की पहुंच और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।

क्या हर फरियादी 100 किलोमीटर का सफर तय करेगा?

जमुना कोतमा अनूपपुर जिला मुख्यालय से बिजुरी करीब 55 किलोमीटर, पसान करीब 35 किलोमीटर, कोतमा करीब 40 किलोमीटर, राजेंद्रग्राम करीब 70 किलोमीटर और अमरकंटक करीब 100 किलोमीटर दूर है। ऐसे में सवाल यह है कि इन क्षेत्रों के ग्रामीण, बुजुर्ग, महिलाएं और आर्थिक रूप से कमजोर लोग अपनी छोटी-बड़ी समस्याओं को लेकर जिला मुख्यालय तक बार-बार कैसे पहुंचेंगे?

विशेषकर भारी बारिश के मौसम में इतनी दूरी तय करना आम नागरिकों के लिए आसान नहीं है। आने-जाने का खर्च, समय और अन्य परेशानियां भी किसी फरियादी के लिए कम चुनौती नहीं हैं। ऐसे में यदि जनसुनवाई का उद्देश्य वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना है तो व्यवस्था को जिला मुख्यालय तक सीमित रखना कितना प्रभावी होगा, यह विचारणीय विषय है।

जनप्रतिनिधियों से सीधी मांग—जनता तक पहुंचाएं जनसुनवाई

क्षेत्र की जनता की मांग है कि सांसद, विधायक एवं अन्य जनप्रतिनिधि निर्धारित दिवसों पर स्वयं अलग-अलग क्षेत्रों में पहुंचकर जनसुनवाई करें।

एक दिन कोतमा, एक दिन पसान, एक दिन बिजुरी, एक दिन राजेंद्रग्राम और एक दिन अमरकंटक में जनसुनवाई आयोजित की जाए। संबंधित अधिकारियों को भी मौके पर उपस्थित कराया जाए, ताकि शिकायतें केवल दर्ज न हों बल्कि उनके निराकरण की प्रक्रिया भी वहीं से शुरू हो।

यदि जनप्रतिनिधि वास्तव में जनता की समस्याओं को प्राथमिकता देते हैं तो उन्हें यह पहल स्वयं करनी चाहिए। आखिर लोकतंत्र में जनता जनप्रतिनिधियों तक पहुंचे या जनप्रतिनिधि जनता तक—इसका फैसला कौन करेगा?

सिर्फ सुनवाई नहीं, समाधान भी चाहिए

सहयोग सेल में कितनी शिकायतें आईं, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि कितनी शिकायतों का समयसीमा में समाधान हुआ। जनसुनवाई की सफलता का पैमाना भाजपा कार्यालय में जुटने वाली भीड़ या कार्यकर्ताओं की उपस्थिति नहीं, बल्कि दूरस्थ गांवों के उस आम नागरिक की समस्या का समाधान होना चाहिए, जो सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते थक चुका है।

जनता का सवाल साफ है—जब सांसद, विधायक और जनप्रतिनिधि जनता के वोट से चुने गए हैं, तो फिर समस्याएं लेकर जनता ही उनके कार्यालय तक क्यों दौड़े? क्या जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही यह नहीं बनती कि वे स्वयं जनता के बीच जाएं?

अब भाजपा संगठन और जिले के सांसद-विधायकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि सहयोग सेल को केवल जिला कार्यालय की चारदीवारी तक सीमित रखा जाता है या इसे कोतमा, पसान, बिजुरी, राजेंद्रग्राम और अमरकंटक तक पहुंचाकर वास्तव में जनता का सहयोग सेल बनाया जाता है

सवाल भाजपा से भी है और सत्ता से भी—जनसुनवाई जनता के दरवाजे तक कब पहुंचेगी?


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