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घर के भेदी लंका ढाए, रावण वध के साथ ही रामलीला का अंत

समाज जागरण नोएडा डेस्क

कहते है न अगर घर का भेदी हो तो लंका मिनटो मे ढहाए जा सकते है। आज विजय दशमी का यह पर्व कई मायनों मे महत्वपूर्ण है। सबस ज्यादा महत्वपूर्ण है क्या हम अपने अंदर के रावण आज समाप्त कर पाएँगे। मन के रावण तो दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है भले हम कितने भी शपथ ले ले। रावण रुपी राजनीतिक जिसको आप विभिषण भी कह सकते है, या फिर सकूनी भी। राजनीतिक एक ऐसा विभिषण है जिसके कारण न सिर्फ देश बल्कि आज परिवार भी खतरे मे है। जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद की जहर लिये यह एक समाजिक विभिषिका है।

जब भगवान राम स्वयं ही विष्णु अवतार थे तो उनको यह भी तो पता होगा ही कि रावण कैसे मरेगा। लेकिन विभिषण का भेद खोलने तक इंतजार किया और जब भेद खुल गया तो रावण को स्वर्ग लोक भेज दिया। संसार को संदेश दिया कि आप कितने बलशाली हो लेकिन अगर कोई आपके अपने पक्ष के दुसरे पक्ष मे हो तो आपका सर्वनाश निश्चित है।

आज देशभर मे विजयदशमी का पर्व मनाया जा रहा है लाखों के संख्या मे रावण दहन किए जायेंगे। राजनीति मे एक दूसरे को रावण बताकर पुतला फुकेंगे। लेकिन होगा क्या? कल से फिर यही रावण रूपी राजनीतिक जनता को नोचने खसोटने का काम करेंगे।

हमे बडा हैरानी होता है जब रामलीला के मंच को राजनीतिक बना दिया जाता है। अपने आपको रामभक्त साबित करने की पुरजोर आजमाइश होता है लेकिन उन्ही के लोग जब रामचरितमानस को जलाते है तो चुप्पी साध लेते है। यह राजनीति का असली चेहरा है। यह कहे कि रामलीला मंचन भी अब राजनीतिक प्रचार प्रसार का जरिया बन गया है। क्या इस देश मे साहित्यकार नही है, रिटायर्ड फौजी नही है, जिनसे रामलीला के मंचन शुभारंभ कराया जा सकता है।


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