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अन्न की महत्ता और भूखों के लिए एक एक निवाले का महत्व ।

सनातनियों ने अपने जीवन के व्यवस्था में अनाज को सिर्फ भोजन के लिए ही नहीं बल्कि उसके उद्देश्य, आकार, प्रकार, औ संस्कार पर भी विशेष प्रकाश डाला है ।

भूखों की जमात से एक
तड़पा भूखा
कोई ऐसा भी तो निकले
जो भोजन के निवाले की
प्राण दाई अमृत ग्रास का उद्देश्य
क्या है
कहीं अमृत के बजाय
मौत के दरवाजे की गुलामी का बस जीने की टानिक तो नहीं
सनातन अपने संस्कारों की बगिया से चाहे जो भी जीवन चक्र व्यवस्था बनाई। अनाज तथा भोजन पर अत्यधिक प्रकाश डाला । सनातनीयों का चाहे जो व्यवस्था जिसे साजिश तहत धर्म से बांधी गई । अनाज को ईश्वर का प्रसाद माना है । हिंदू व्यवस्था तहत तो ईश्वर को ही सर्वप्रथम अनाज उत्पन्न तथा व्यंजन बनाकर ग्रहण करते वक्त भी अपनी पेट की भी भूख की तड़प को परोसा व्यंजन तक रोककर मानवीय कमल कामना की उद्देश्य स्मरण कर तन से मन तक, ईश्वर को खाने देकर ही थोड़ी सी अग्रसन । फिर खुद खाते थे क्योंकि अब तो कोई ना बताए बाजार से यह सुविधा विलुप्त हो गई है ।अरे कुछ ना दिखे तो यह साइंस भी प्रमाणित करती है कि हिंदुओं की लंबाई औसतन 10 से 11 फीट हुआ करती थी । वह बातें खाद या हाइब्रिड के खाने से ऐसा है नहीं यह कमाल इस विधि का है मगर बेचारी हिंदू की है भी थप्पा धर्म की रूढ़िवादी विचारधारा से बांधकर रखने के लिए। जबकि हिंदू कहे जाने वाले लोग भी इसे नहीं करते।
अच्छा एक बात और इसकी प्रमाण समझनी हो या जिज्ञासा हो कि शायद शायद सही है तब महाभारत की एक छोटी घटना को ले लीजिएबात उस समय की थी । जब द्रोपती का चीर हरण हो चुका था । राजा से दास तक कि जीने या ऐसो आराम यातना वाली व्यवस्था क्या शत-प्रतिशत प्रकृति युक्त है की जानकारी दीयूट कीड़ा में हारकर चक्रवर्ती सम्राट युधिष्ठिर सब कुछ समझ चुके थे । धर्म के लिए न्याय के लिए शांति के लिए व्यवस्था जो युद्ध रोकने के लिए होती है वह भी प्रकृति नियम नहीं तोड़ सकती । इसलिए इंसान सर्वप्रथम सभी हैं और जब भी इंसानियत कुचली जाएगी तब हरनीति , कूटनीति युद्ध नीति बन जाती है । यह उन्होंने महसूस की और धर्म युद्ध का प्रण ले पांचों भाई तथा द्रोपदी वन को चले जाते हैं । क्योंकि दास प्रथा से मुक्ति के शर्त थी 14 साल बनवास 1 साल अज्ञातवास।
यहां थोड़ा सा मैं कहना चाहूंगा कि महाभारत काल में कूटनीतिज्ञ के मामले में सर्वश्रेष्ठ एक ही नहीं दो थे सर्वप्रथम सकुनी ,दूसरा श्री कृष्ण । दोनों ने पूरी जिंदगी कूटनीति की चालें चली । शकुनी महलों की ऐसो आराम अयाशियों तथा कौरव सेना की छात्रा छाया ,रक्षा में कूटनीति चाले चली जबकि कृष्ण तो बेचारा जेल से कूटनीति चाले चली । सकुनी जब भी चाले चली स्वार्थ पूर्ण की हवस इतनी प्रबल कि मानव से मानव तक की हत्या कराई ।जबकि कृष्ण की कूटनीति मानव की हत्या कर मानवता बचाने की स्वार्थ के लिए थी जो उनकी हर बाधा भी लक्ष्य को हवस ना बनने दी और श्रीकृष्ण ईश्वर की तरह पूजनीय बन गए ।
अब बनवास की घटना पर देखिए पांडव बेचारे जंगल चले गए समाज से भी बहिष्कार किया जा चुका था हस्तिनापुर बड़ी थी । सुरक्षित थी । मगर वहां रह नहीं सकते थे ।
जहां भी रहे 14 वर्ष की वनवास का समय वहा वाले वे लोग भी दुर्योधन के खौफ से सामाजिक बहिष्कार कर चुके थे । जीने के लिए हर जमाने में रोटी, कपड़ा, मकान जरूरी है । उनका झोपड़ी घर और खाने को बर्तन सिवा कुछ भी नहीं । वह भी बर्तन मिट्टी के। अरे उनके पास खरीदने के लिए पैसे कहां । मुफ्त तो आती नहीं । कपड़े के रूप में बस गुप्तांग ढका क्योंकि जमाने को दिखाना था कि द्रोपती सहित पांडव के जिस्म ढके हैं । जबकि उनकी आत्मा तक नंगी हो चुकी थी वह भी हस्तिनापुर न्याय दरबार में । पृथ्वी क्या तिलोक तक को पता ना चले ऐसा हो नहीं सकता ।इसलिए पांडव अपनी जिस्म पर कपड़े तक को बर्दाश्त कर नहीं पा रहे थे । शकुनी को यहां भी चैन ना आया उसने कूटनीति में ऐसी अंधा घमंडी बन गया कि यातनाएं क्रूरता तक बदल गई ।उसने दुर्योधन ,दुशासन तथा करण को जंगल जाकर पांडवों को यातना दो ऐसा मजबूर करो कि वह नियम तोड़कर युद्ध लड़ने लगे ।तब इंसाफ तहत उनकी हत्या कर दी जाए । दुर्योधन तामझाम लाओ लश्कर लेकर पांडव के निवास स्थान करीब आकर रहने लगा । दुर्योधन ने देखा पांडव जैसे तैसे रह ले रहे हैं । मगर बेचारे अनाज के अभाव में टूटे हैं ।उनकी कुटिया के सामने जूठा भोजन वह भी वही वही जो पांडवों को प्रिय थी ।फेंकी जाती थी ।पांडव द्रौपदी संग देखा करते थे । हर रोज का ड्रामा ।युधिष्ठिर को छोड़ सभी उत्तेजित होकर लड़ने तक उतावला हो जाते थे। युधिष्ठिर फेंके गए भोजन के करीब 1 स्थान बैठकर सिर्फ निहारते ।घंटों ।मगर किसी को कुछ नहीं कहते ।कई दिन ऐसा चलता रहा ।इसी बीच एक घटना हुई जो अस्तित्व मैं नहीं मगर इसी अनाज के भोजन की सच्चाई बता दी ।कृष्ण वहां आए थे । द्रौपदी, अर्जुन ,भीम ,नकुल, सहदेव युधिष्ठिर की चुप्पी तथा अन्याय सहन को उनकी कायरता कह रहे थे । कोस रहे थे ।तब श्री कृष्ण ने सब को डांटा और झोपड़ी के बाहर ले गए । व्यंजन जो हर रोज जहां पर फेंकी जा रही थी दिखाया । घर के बाहर बैठा एक कुत्ते की और दिखाएं । यहां पर दो कुत्ते थे और आगे बताया की दोनों ने एक ही समय अंतराल फेंके जाने वाले स्थान पहुंचकर पांडवों में से युधिष्ठिर को दिखाते हुए भोजन के सैनिक उन्हीं दोनों कुत्ते को खिलाकर भोजन जूठा कराया था। दूसरा दिन भी खाने के लिए वह भी इतनी स्वादिष्ट दोनों कुत्ते आपस में लड़ गए ।इनमें से एक जख्मी हो असहाय हो गया । वह गिर गया ।जबकि दूसरा खाया । मगर जूठन करने तक ही ।मगर जख्मी पर युधिष्ठिर की नजर पड़ी । युधिष्ठिर उसे उठाया । प्यार की हाथ रखी । पानी पिलाई । क्योंकि उनके पास वही थी । कंदमूल तोड़कर कुत्ते को खाने अमृत ग्रास बना कर दी ।कुत्ता खाता तो नहीं । मगर मरता क्या न करता । ऊपर से युधिष्ठिर को उसे बचा ले ने कि मोहब्बत उसे खाने को मजबूर कर दी । यही मोहब्बत इस कुत्ते को जीने की चाह जगा दी ।वह यही खाकर ठीक हो चला गया और वह बल ,शरीर से स्वस्थ कुत्ता बस जूठन करने तक ही खाने के कारण कमजोर होता चला गया । युधिष्ठिर उसे उपचार सहित प्यार की कामना की दीवानगी इतनी दिखा ई कि वह कुत्ता जी गया और युधिष्ठिर के इस जिंदगी दे देने की तड़प को खुद महसूस कर उनके उसे कंदमूल के व्यंजन खाकर ताकतवर हमलावर हो गया ।वह तेज तरार कातिल कुत्ता दुर्बल तथा भ्रष्ट हो गया । एक दिन वही कुत्ता युधिष्ठिर के इंसाफ को महसूस की । कुत्ते की फितरत उसकी प्रकृति व्यवस्था तहत हुआ ।युद्ध लड़ा दूसरे कुत्ते से । जंगल का सभी जानवर जो वहां रहा करते थे ।उन्होंने देखा कि कैसे मरा कुत्ता भी जीवित हो ही नहीं इंसाफ करने लायक कैसे जिंदा हो जाता है ।और कैसे ताकतवर व्यंजन खाने वाले कुत्ते इस धर्म युद्ध में मारी गई । और वह कुत्ता मारा गया फिर तो जंगल में कोई जानवर भी उस व्यंजन को जूठन करने के लिए क्या खाने के लिए भी नहीं जा रहे हैं । देखो सैनिक सैनिक बेचारे हारकर दुर्योधन को झूठा या खबर दे रहे हैं कि भोजन झूठा किया जाता है । मगर जानवर मिले तब ना सैनिकों के भोजन फेंकते समय सभी भाग जा रहे हैं सैनिक कुछ देर इंतजार कर बस फेंककर चले जा रहे हैं ।अब तुम बताओ युद्ध तुम्हें चाहिए या बड़े भैया को । तुम्हें भूख मिटाने बदला लेने के लिए युद्ध चाहिए जबकि बड़े भैया को मानवता, मानव मूल्यों के लिए धर्म युद्ध चाहिए । पांडव भी कंदमूल तथा जो मिले उसे ईश्वर को अग्रसेन देकर खाने लगे ।बात को समझ गए हर जख्म दर्द सह लेने को तैयार हो गए ।तथा खुद को धर्म युद्ध लड़ लेने तक सशक्त करने में जुट गए । देर हुई भले मगर युद्ध हुआ और युद्ध में क्या हुआ सभी जानते हैं धर्म जीतकर मानवता की स्थापना की । अब बताइए क्या भोजन देने पर उद्देश्य नहीं ।ग्रहण करने पर उद्देश्य नहीं ।अनेकों उदाहरण है जिससे भोजन की महत्ता को समझी जा सकती है ।जय हिंद

अन्न की महत्ता और भूखों के लिए एक एक निवाले का उद्देश्य

कुमार गौरव
ग्राम पंडरिया
पोस्ट थाना इमामगंज
जिला गया बिहार

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