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जातीय व्यवस्था: सामाजिक संतुलन की जड़ या राजनीति का हथियार?



भारत की जातीय व्यवस्था उस वटवृक्ष की तरह है जो चारों दिशाओं से ऊर्जा लेकर समाज को जीवित रखता है। जैसे सूर्य की किरणें पेड़ को जीवन देती हैं, वैसे ही वर्ण और जाति आधारित सामाजिक संरचना ने सदियों से भारतीय समाज को संतुलन और दिशा दी है।

लेकिन आज उसी व्यवस्था को जाति की राजनीति ने विकृत कर दिया है। जो व्यवस्था कर्म, गुण और योग्यता पर आधारित थी, उसे अब वोट और लाभ की गणनाओं में बाँट दिया गया है। समाज भी इस खेल का अनजाने में हिस्सा बन गया है।



जब एक ही परिवार में सभी सदस्य समान नहीं हो सकते — कोई अधिकारी बनता है, कोई मजदूर, कोई व्यापारी — तो पूरे समाज में समानता की एक जैसी अपेक्षा कैसे की जा सकती है? प्रत्येक व्यक्ति को उसके परिश्रम और गुण के अनुसार ही फल मिलना चाहिए। यही प्रकृति का नियम है।

एक व्यवसायी जब हजारों लोगों को रोजगार देता है, तो उसमें हर जाति और वर्ग के लोग काम करते हैं। पद किसी की जाति से नहीं, बल्कि उसकी क्षमता से तय होता है। फिर केवल जाति को ही भेदभाव का आधार मानना समाज के साथ अन्याय नहीं तो और क्या है?

आज कुछ लोग यह सोचते हैं कि सफल लोगों की उपलब्धियाँ और संपत्ति सबमें बाँट दी जाएँ, ताकि समानता आ सके। पर ऐसी सोच मेहनत को हतोत्साहित करती है और समाज में निर्भरता को बढ़ाती है।

भारतीय सनातन परंपरा का सार यही है कि हर व्यक्ति अपने गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार समाज को ऊर्जा दे। यही संतुलन हमारी सभ्यता की आत्मा है — और यही वह वृक्ष है, जिसकी जड़ों को राजनीति नहीं, समाज की समझ और सामंजस्य सींच सकता है।


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