भारत की जातीय व्यवस्था उस विशाल वटवृक्ष की तरह है जो चारों दिशाओं से प्राप्त होने वाली ऊर्जा से स्वयं को पोषित करता है। जैसे सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक पेड़ पर विभिन्न दिशाओं से पड़ने वाली किरणें उसे जीवित रखती हैं, वैसे ही भारत की वर्ण व्यवस्था और उसकी जातीय शाखाएँ समाज को निरंतर ऊर्जा प्रदान करती हैं। यह केवल भारत की ही व्यवस्था नहीं है, बल्कि समस्त मानव समाजों में किसी न किसी रूप में ऐसी संरचनाएँ विद्यमान हैं — कहीं यह अधिक स्पष्ट हैं, तो कहीं कम।

परंतु आज के दौर में जाति के नाम पर राजनीति कर इस संतुलित व्यवस्था को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। विडंबना यह है कि इसमें समाज स्वयं भी उतना ही जिम्मेदार है। जब एक परिवार में सभी सदस्य समान नहीं हो सकते, पूरे समाज में समानता की एक जैसी व्यवस्था की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
एक ही परिवार में चार भाई होते हैं — कोई क्लर्क बनता है, कोई डीएम, कोई व्यवसायी और कोई मजदूर। क्या यह उचित होगा कि कहा जाए कि सभी को डीएम की कुर्सी मिले? यह तो असंभव है। प्रत्येक व्यक्ति को उसकी मेहनत, योग्यता और गुणों के अनुसार ही फल प्राप्त होता है।
इसी प्रकार एक व्यवसायी जब अपना उद्योग खड़ा करता है, तो वह हजारों-लाखों लोगों को रोजगार देता है। उस उद्योग में सभी वर्गों और जातियों के लोग अपनी क्षमता और योग्यतानुसार कार्य करते हैं। इस परिस्थिति में केवल जाति के आधार पर भेदभाव का आरोप लगाना अनुचित प्रतीत होता है। यदि भेदभाव की बात करें, तो वह केवल जातिगत नहीं, बल्कि भाषा, क्षेत्र, रंग और धार्मिक रीति-रिवाजों के स्तर पर भी समाज में मौजूद है।
आज कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि समाज में समानता लाने के लिए सफल व्यक्तियों की उपलब्धियाँ और धन सभी में बाँट दिए जाएँ। किंतु यह विचारधारा समाज में आलस्य और निर्भरता को जन्म देती है। जब परिश्रम का मूल्य घटता है, तो प्रगति की भावना भी समाप्त हो जाती है। समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब हर व्यक्ति अपने कर्म और क्षमता के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर पाए।
भारतीय सनातन व्यवस्था का मूल तत्व ही यह है कि हर व्यक्ति अपने गुण, कर्म और स्वभाव के अनुसार समाज में योगदान दे। यही संतुलन हमारी सभ्यता की जड़ है — जिसे समझना और सहेजना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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