उजाले की दिशा

//कहानी//
होमा आसिया

बेंगलुरु

गाँव में उस सुबह की धूप कुछ अलग थी।
ठंड अब भी हवा में थी, लेकिन सूरज की किरणों में एक नरमी उतर आई थी—जैसे किसी ने चुपचाप कह दिया हो, अब आगे बढ़ने का समय है। मकर संक्रांति का दिन था।
राघव अलाव के पास बैठा तिलगुड़ की डली हाथ में घुमाता रहा। पिता की याद उसे हर संक्रांति पर वैसे ही घेर लेती थी जैसे धुंध खेतों को ढक लेती है। पिछले साल इसी मौसम में पिता चले गए थे। वही पिता जो कहते थे—
“जब सूरज अपनी दिशा बदलता है, तब इंसान को भी अपने मन की दिशा बदलनी चाहिए।”
माँ आँगन में चूल्हे पर तिल भून रही थीं। हर चटख की आवाज़ राघव के दिल में कोई पुरानी तस्वीर जगा देती। माँ ने बिना उसकी ओर देखे कहा,
“आज पतंग नहीं उड़ाओगे?”
राघव ने हल्की मुस्कान दी।
“पिताजी के बिना मन नहीं करता, माँ।”
माँ कुछ पल चुप रहीं। फिर बोलीं,
“उड़ाना छोड़ दोगे तो क्या वो वापस आ जाएँगे?”
राघव चुप हो गया। सच कड़वा था, लेकिन सच था।
छतों पर बच्चे शोर मचा रहे थे। रंगीन पतंगें आसमान में ऐसे तैर रही थीं जैसे किसी ने सपनों को डोर से बाँध दिया हो। माँ ने तिलगुड़ उसकी हथेली पर रख दिया।
“ले, मीठा खा। आज कड़वा सोचने का दिन नहीं है।”
राघव ने पहली बार उस दिन आसमान की ओर देखा। सूरज ऊपर था, सीधा, स्थिर—और फिर भी अपनी राह बदल चुका था। उसे पिता की बात याद आई। शायद यही समय था।
उसने छत पर कदम रखा। हाथ काँप रहे थे, लेकिन डोर कसकर पकड़ी। पतंग हवा में गई—डगमगाई, लड़ी, कटते-कटते बची—और फिर थिर होकर उड़ने लगी।
राघव की आँखें भर आईं।
कभी-कभी उड़ना सिर्फ खुशी नहीं होता,
कभी-कभी उड़ना स्वीकार करना होता है।
शाम को गाँव के बुज़ुर्गों के साथ बैठकर उसने तिलगुड़ बाँटा। किसी ने कहा,
“संक्रांति सिखाती है—मीठा बोलो, आगे बढ़ो।”
राघव ने मन ही मन उत्तर दिया—
और यादों को साथ लेकर चलो।
सूरज ढल रहा था, लेकिन उजाला भीतर उतर चुका था। मकर संक्रांति ने सिर्फ मौसम नहीं बदला था, उस दिन राघव की दिशा भी बदल गई थी।

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