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“डॉक्टर बीमार क्यों है और चपरासी सबसे ज़्यादा समझदार क्यों?”

आज का दौर अंकों और योग्यताओं के अजीब विरोधाभास से गुजर रहा है। जिस शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य प्रतिभा को निखारना और मेहनत को सम्मान देना था, वही व्यवस्था आज एक कड़वे व्यंग्य का विषय बन चुकी है। हालात इतने विचित्र हो गए हैं कि 40 प्रतिशत अंक पाने वाला “डॉक्टर” बनकर समाज का रक्षक कहलाता है, जबकि 90 प्रतिशत अंक लाने वाला उसी डॉक्टर के सामने फ़ाइल थामे खड़ा दिखाई देता है। यह दृश्य सिर्फ किसी व्यक्ति की विडंबना नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर करारा तमाचा है।

शिक्षा अब ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि काग़ज़ी प्रमाणपत्रों का खेल बनती जा रही है। अंकों का असली मूल्य मेहनत और समझ से नहीं, बल्कि कोटा, सिफारिश, रसूख और प्रबंधन सीटों से तय होने लगा है। जो छात्र वर्षों तक रात-रात भर जागकर पढ़ाई करता है, वह यह मानकर चलता है कि उसकी मेहनत एक दिन उसे ऊँचाइयों तक ले जाएगी। लेकिन जब वही छात्र देखता है कि कम अंक वाला व्यक्ति प्रभाव और धन के सहारे बड़े पदों पर पहुँच गया, तो उसके आत्मविश्वास पर गहरा आघात लगता है।

यह विडंबना केवल नौकरी तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की नैतिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। जब जिम्मेदार पदों पर योग्यता के बजाय व्यवस्था की चालाकियाँ बैठा दी जाती हैं, तो परिणाम पूरे समाज को भुगतने पड़ते हैं। क्या हम सच में ऐसे डॉक्टर, इंजीनियर या अधिकारी चाहते हैं, जिनकी योग्यता अंकों से नहीं, बल्कि संपर्कों से तय हुई हो? और क्या हम उस प्रतिभा को हमेशा चपरासी, क्लर्क या अस्थायी कर्मचारी बनाकर कुचलते रहेंगे, जिसने सच में मेहनत की है?

यह व्यंग्य हमें हँसाता नहीं, बल्कि भीतर से बेचैन करता है। यह सोचने पर मजबूर करता है कि अगर यही क्रम चलता रहा, तो आने वाली पीढ़ियाँ मेहनत पर नहीं, जुगाड़ पर भरोसा करेंगी। शिक्षा का उद्देश्य तब केवल डिग्री पाना रह जाएगा, इंसान बनाना नहीं।

असल ज़रूरत व्यवस्था को आईना दिखाने की है। ताकि एक दिन ऐसा न हो कि समाज यह सवाल पूछे— “डॉक्टर बीमार क्यों है और चपरासी सबसे ज़्यादा समझदार क्यों?” यही इस व्यंग्य की सबसे बड़ी सच्चाई और सबसे कड़वी हँसी है।


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