(गुरु पूर्णिमा पर विशेष)
सच्चिदानंद वर्मा
गुरु पूर्णिमा गुरु के प्रति श्रद्धा ,भक्ति व आदर प्रकट करने का दिन है। शिष्यों के लिए अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए यह दिन विशेष अवसर के रूप में आता है। जरूरी नहीं कि गुरु सशरीर ही हों, गुरु देह त्याग चुके भी हो सकते हैं। यहां हम उस गुरु की बात कर रहे हैं जिन्होंने ईश्वर प्राप्त कर लिया है तथा जो अपने शिष्यों को आत्मसाक्षात्कार का मार्ग दिखाते हैं।
“गुरु” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। “गु” का अर्थ है अन्धकार, और “रु” का अर्थ है समाप्त करना या भंग करना। गुरु जन्म-जन्मान्तर तक हमारे हाथों को थामे रखते हैं जब तक कि हम माया की अन्धकारपूर्ण गलियों को पार कर अपने वास्तविक निवास अर्थात् आत्मज्ञान में स्थित होकर सुरक्षित नहीं हो जाते।
गुरु को हम नहीं खोजते हैं, अपितु स्वयं गुरु ही हमें खोज लेते हैं। जब सर्वाेच्च सत्य को प्राप्त करने की हमारी लालसा अत्यधिक तीव्र हो जाती है, तो ईश्वर हमें आत्म-साक्षात्कार की चुनौतीपूर्ण यात्रा पर ु मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए एक ईश्वरीय माध्यम अर्थात् गुरु को भेजकर प्रत्युत्तर देते हैं। ऐसे गुरु ईश्वर द्वारा निर्धारित होते हैं। वे ईश्वर के साथ एकाकार होते हैं और उन्हें धरती पर ईश्वर के एक प्रतिनिधि के रूप में उपदेश देने की ईश्वरीय स्वीकृति प्राप्त होती है। गुरु मौन ईश्वर की अभिव्यक्त वाणी हैं। परमहंस योगानन्द एक ऐसे ही सच्चे गुरु थे जो दिव्य गुरुओं की परम्परा से थे और जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व में क्रियायोग मार्ग के ज्ञान का प्रसार करने की दिशा में कार्य किया।

भारत के संतों के अनुसार गुरु धरती पर सिर्फ इसलिए अवतार लेते हैं ताकि वे मनुष्यों का उद्धार कर सकें। विशेषकर उन लोगों का जो जीवन मरण के दुष्चक्र से छुटकारा पाना चाहते हैं। गुरु उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं तथा भवसागर पार करा देते हैं। गुरु जाति , संप्रदाय,धर्म व देश तक सीमित नहीं होते हैं। वे पूरे संसार के लिए होते हैं। असल में , गुरु मनुष्य के रूप में साक्षात ईश्वर ही होते हैं। वो जो बोलते हैं वह सब ईश्वर उनसे बुलवाते हैं। हमें गुरु में पूर्ण निष्ठा व समर्पण होना चाहिए। जब हम गुरु में समस्वर हो जाते हैं तो वे हमारे सारे कर्म अपने ऊपर ले लेते हैं। फिर वे हमारे जीवन को अपनी योजनानुसार चलाते हैं। गुरु में तीन गुण होते हैं। वे सर्वज्ञ ,सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक होते हैं। हमारे गुरु परमहंस योगानंद ने अपनी विश्व विख्यात पुस्तक योगी कथामृत में लिखते हैं कि महावतार बाबाजी ने अपने शिष्य योगावतार लाहिड़ी महाशय से बोला था कि पश्चिम देशों के अनके मुमुक्षुओं के ज्ञान स्पंदन बाढ़ की भांति मेरी ओर आते रहते हैं। मैं अमेरिका और यूरोप में संत बनने योग्य अनेक लोगों को देख रहा हूं,जिन्हें जगाए जाने भर की देर है। उन्होंने लाहिड़ी महाशय द्वारा सारे संसार को क्रिया योग दिया जिसके द्वारा ईश्वर प्राप्ति के इच्छुक लोग आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर रहे हैं। इसी क्रिया योग के प्रचार प्रसार के लिए महावतार बाबाजी ने परमहंस योगानंद को चुना था जिनको प्रशिक्षित करने का जिम्मा महाअवतार बाबाजी ने ज्ञानावतार स्वामी श्रीयुक्तेश्वर को दिया था। परमहंस योगानंद ने गुरु शिष्य परंपरा को आगे बढाया और इसका परिणाम है कि आज आध्यात्म के क्षेत्र में तरक्की के लिए पूरा विश्व भारत की ओर आकर्षित हो रहा है। पूरे विश्व में परमहंस योगानंद के अनुयायी हैं जो उनके बताए मार्ग राजयोग पर चल कर ईश्वरानुभूति में आनंदित हैं। उन्होंने पूरे संसार को ज्ञान का भंडार दिया है। अनेक पुस्तक व धर्मग्रंथों पर भाष्य लिखा है। ईश्वर प्राप्ति के इच्छुक भक्तों के लिए एक विशेष पाठ्यमाला भी है। परमहंस योगानंद ने भारत में योगदा सत्संग सोसायटी व अमेरिका में सेल्फ रिएलाइजेशन फेलोशिप स्थापित कर अपने शिष्यों के लिए अनेक आश्रम व सेंटर खोल दिए थे। जहां आत्मसाक्षात्कार के लिए आतुर उनके अनेक शिष्य प्रशिक्षित हो रहे हैं।गुरु पूर्णिमा ऐसे ही गुरुओं के प्रति प्रेम, भक्ति व कृतज्ञता को प्रकट करने के अवसर के रूप में आता है।
( लेखक स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार हैं )



