अनूपपुर।इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक द्वारा जनजातीय गौरव दिवस अत्यंत हर्षोल्लास और भव्यता के साथ मनाया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के समस्त डीन, विभागाध्यक्ष, वार्डन, प्रॉक्टर, कृषि विज्ञान केंद्र, केंद्रीय विद्यालय तथा ट्राइबल मॉडल स्कूल के हजारों छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय मुख्य द्वार पर स्थापित भगवान बिरसा मुंडा की विशाल प्रतिमा पर माल्यार्पण से हुआ। इस अवसर पर मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र के सह क्षेत्र प्रचारक प्रेमशंकर सिदार, मुख्य अतिथि दिलीप जायसवाल, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), विशिष्ट अतिथि रामलाल रौतेल, अध्यक्ष (कैबिनेट मंत्री दर्जा), कोल जनजातीय विकास प्राधिकरण, तथा हीरा सिंह श्याम, भाजपा जिला अध्यक्ष, श्रीमती मिथिलेश प्रमोद मरावी, जनपद अध्यक्ष, मोरध्वज पैकरा, कार्य परिषद सदस्य, प्रो. ब्योमकेश त्रिपाठी, कुलपति, प्रो. तरुण ठाकुर, राजेन्द्र तिवारी, जिला संघ चालक, लवकेश जायसवाल, बबलू अग्रवाल, विभाग प्रचारक कमल राठौड़, जिला प्रचारक दीपक जी एवं महाकौशल जनजाति कार्य प्रमुख रविकांत सहित अनेक गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम का संचालन डीन, चीफ वार्डन एवं भगवान बिरसा मुंडा व्याख्यानमाला समिति के अध्यक्ष प्रो. विकास सिंह ने किया।

17 वर्षों में पहली बार निकला तीन किलोमीटर लंबा जनजातीय गौरव यात्रा
विश्वविद्यालय की स्थापना के 17 वर्षों के इतिहास में पहली बार तीन किलोमीटर लंबा भव्य जनजातीय गौरव यात्रा निकाला गया। ट्राइबल मॉडल स्कूल, केंद्रीय विद्यालय तथा विश्वविद्यालय के 36 विभागों के हजारों छात्र-छात्राओं ने पारंपरिक परिधानों में, जनजातीय संगीत व नृत्य के साथ सहभागिता की। इस यात्रा में कश्मीर से कन्याकुमारी तक के 26 राज्यों से आए युवाओं ने भाग लिया। कार्यक्रम का लाइव प्रसारण किया गया तथा पूरे आयोजन की ड्रोन शूटिंग भी की गई।
जनजातीय महोत्सव के अंतर्गत आयोजित जनजातीय शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, परंपरा, हितरक्षा, स्वावलंबन, खेल महोत्सव, लेखन प्रतियोगिता, क्विज़, मैराथन रन, एवं महानायक गाथा लेखन जैसी 15 प्रतियोगिताओं में सैकड़ों विद्यार्थियों को प्रमाणपत्र, मेडल एवं पुरस्कार प्रदान किए गए।
सह क्षेत्र प्रचारक प्रेमशंकर सिदार के उद्बोधन से भावविभोर हुआ सभागार
मुख्य वक्ता प्रेमशंकर सिदार ने अपने प्रेरक संबोधन में कहा कि वैदिक काल से चली आ रही भारत की सांस्कृतिक परंपरा, भारत की स्वतंत्रता और विकास यात्रा में जनजातीय समाज का योगदान अद्वितीय रहा है।” उन्होंने कहा कि “भारत को गौरवशाली बनाए रखने के लिए हमारे जनजातीय स्वाधीनता सेनानियों और महापुरुषों ने अपने प्राणों की आहुति दी। आज का यह अवसर उनके त्याग और बलिदान को स्मरण कर उनसे प्रेरणा ग्रहण करने का है। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि तिलका मांझी ने 1771 से 1785 तक ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध संथाल विद्रोह का नेतृत्व किया, जबकि फूलो और झानो बहनों ने 1855 के संथाल हूल आंदोलन में सिदो, कान्हू, चांद और भैरव के साथ अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। “जनजातीय गौरव दिवस हमें इन सभी महान नायकों के बलिदान से सीखने और उनके पदचिह्नों पर आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करता है,” उन्होंने कहा।
दहेज और सती जैसी कुरीतियों से जनजातीय समाज सदा मुक्त रहा-सिदार
सिदार जी ने कहा कि जनजातीय संस्कृति और परंपरा का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है। जनजातीय समाज दहेज प्रथा, सती प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों से सदैव मुक्त रहा है। उन्होंने कहा कि “जनजातीय समाज आज भी वैदिक जीवन मूल्यों पर आधारित है — जहां भाषा, जाति और क्षेत्र के भेदभाव का कोई स्थान नहीं। यह समाज सबका सम्मान करने और अनुशासन में जीवन जीने का आदर्श प्रस्तुत करता है।”
तीर्थस्थलों में आज भी जनजातीय पुजारी परंपरा जीवित-सिदार
उन्होंने आगे कहा कि छत्तीसगढ़ के 36 गढ़ों में से 25 गढ़ों के राजा जनजातीय समाज से आते हैं। भारत के कई प्रमुख तीर्थ, मठ और मंदिरों में आज भी जनजातीय समाज के लोग पुजारी के रूप में पूजन-अर्चन करते हैं। उन्होंने कहा कि “जनजातीय समाज में गोत्र परंपरा सनातन संस्कृति से जुड़ी है, और यही भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की जीवंत धारा है। उन्होंने कहा कि “भारत को एकता, संस्कृति और आत्मनिर्भरता की दिशा में जनजातीय समाज ने सदैव मार्गदर्शन दिया है। सनातन धर्म के अनेक मंदिरों में आज भी जनजातीय पुजारी हैं, जिनकी पूजा में देवी-देवता साक्षात प्रकट होते हैं — यही जनजातीय आध्यात्मिकता की सबसे बड़ी पहचान है।
जनजातीय संस्कृति का अध्ययन राष्ट्रीय पुनर्जागरण की कुंजी
अपने प्रेरक संबोधन के अंत में श्री सिदार ने कहा कि जनजातीय संस्कृति, जीवन पद्धति और अध्यात्म का अध्ययन राष्ट्रीय पुनर्जागरण का आधार बन सकता है। जनजातीय समाज ने सदैव प्रकृति, समाज और संस्कृति के संतुलन की शिक्षा दी है। उन्होंने कहा कि यदि आधुनिक भारत को विकसित भारत बनना है, तो उसे जनजातीय समाज के इस संतुलित और समरस जीवन दर्शन को आत्मसात करना होगा।
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