समाज जागरण डेस्क
देश के राजधानी दिल्ली हो या फिर हो महाराष्ट्रा के नासिक, मध्यप्रदेश के गुणा जिला हो या फिर झारखंड। चारो तरफ पानी के संकट इतना गहराया हुआ है कि लोगों को कुएँ मे उतरकर गंदा पानी भरना पड़ रहा है। यह संकट कोई नया है यह कहना सरासर गलत होगा। क्योंकि अगर नया कहेंगे तो वर्तमान सत्ता मे बैठे लोग नाराजा हो जायेंगे और समस्या को दिखाने वालों पर एफआईआर करवा देंगे। क्योंकि तथाकथित राजनीतिक का नया शिकार आजकल मिडिया ही है, जहाँ दो कोड़ी के गमछा छाप नेता कुछ भी बोले तो लोग चुप रह जाते है और पत्रकार सच बोले तो उससे यह कहकर ट्रोल किया जाता है कि गाली दी है। ताजा उदाहरण रजत शर्मा इंडिया टीवी है।
खैर हम बात पानी को लेकर कर रहे है, पानी रे पानी तेरा रंग कैस, जिसमे मिला तो उस जैसा। लेकिन मिलाएँगे कहां से जब पानी ही नही है। भले ही चुनाव मे 8500 रुपये खटाखट देने की बात हो या फिर नल जल कि सफलता। दावे तो सभी के सफल हो जाते है सोशल मिडिया पर लेकिन हकीकत तो ये है कि देश की जनता 75 साल बाद भी साफ पानी के लिए तरस रही है। महाराष्ट्रा नासिक की यह विडियो इस बात को समझने के लिए काफी है। आज जब इनको पानी की जरूरत है तो नेता आपस मे लड़ रहे है और सरकार बनाने और गिराने की बात कर रहे होंगे ताकि खटाखट करोड़पति बन सके।
एक तो भीषण गर्मी ऊपर से पानी कि किल्लत। वर्तमान सत्ता के दावे और सत्ता पाने के लालच मे किए गए वादे। सब को एक तरफ रख दे तो यही लगता है कि जनता को सरकार से कोई उम्मीदे रखने या करने के बजाय स्वयं ही कदम उठाने चाहिए। ज्ञात हो कि देश मे जो भी बड़े बड़े धरोहर है वह सरकार ने नही बल्कि समाजों ने आपसी सहयोग से बनाए है, जिसमे रिश्वत खाने वाले न कोई नेता रहा होगा नही तो टाइम पास करने वाले अफसर। ग्रामीणों समाजों ने मिलकर ऐसे ऐसे घरोहरों का निर्माण किया है जो सरकार चाहकर भी नही कर सकती है या करा सकती है।

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