नेता बदलते हैं बिजली के बल्ब से भी तेज़, जनता इंतज़ार में कि रोशनी कब जलेगी!
नेपाल का हाल ऐसा हो चुका है मानो पूरा देश राजनीति के “रियलिटी शो” का सेट बन गया हो। यहां सरकारें गिरना और बनना अब कोई घटना नहीं, बल्कि एक “नियमित त्योहार” बन चुका है। जनता को पेट की आग बुझाने की फुर्सत नहीं, और नेता कुर्सी की आग में तप कर अपनी रोटियां सेंक रहे हैं।
हर महीने नया प्रधानमंत्री, हर हफ्ते नया गठबंधन और हर दिन नई बयानबाज़ी—यहां राजनीति इतनी अस्थिर है कि पहाड़ भी इनके आगे स्थिर दिखाई देते हैं। जनता सोचती है कि आखिर लोकतंत्र का मतलब “जन-सेवा” है या “जनता को तमाशा दिखाना”।
नेपाल की संसद इस समय ऐसी लगती है जैसे “म्यूज़िकल चेयर” का खेल चल रहा हो। फर्क बस इतना है कि खेल में जब म्यूज़िक रुकता है तो कोई एक बैठ जाता है, लेकिन यहां जब कुर्सी खाली होती है तो पूरा दल टूटकर दो-दो टुकड़ों में बंट जाता है। नतीजा वही—जनता फिर खड़ी की खड़ी रह जाती है।
महंगाई आसमान छू रही है, नौकरियां धरातल में गड़ी हैं और विकास की फाइलें अलमारियों में धूल खा रही हैं। लेकिन नेताओं के चेहरों पर मुस्कान वैसी ही है, जैसे किसी बच्चे को नया खिलौना मिल गया हो। मानो सत्ता की कुर्सी नेपाल का सबसे बड़ा “टूरिस्ट डेस्टिनेशन” हो, जहां हर नेता सिर्फ फोटो खिंचवाने आता है।
गांव-गांव में लोग गैस, रोज़गार और महंगाई की चिंता में डूबे हैं, पर राजधानी काठमांडू में नेता सिर्फ ये गिन रहे हैं कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। नेपाल के लोकतंत्र की परिभाषा अब बदल चुकी है—
“जनता वोट डालने के लिए है, नेता कुर्सी बदलने के लिए।”

राजनीतिक हलकों में ये मज़ाक खूब चल रहा है कि—
“नेपाल में लोकतंत्र नहीं, लोकतंत्र पर प्रयोग चल रहा है।”
कभी गठबंधन सरकार, कभी अल्पमत सरकार और कभी “ट्रायल वर्ज़न” वाली सरकार। यहां स्थिरता ढूंढना वैसा ही है जैसे पोखरा झील में समुद्र की लहरें ढूंढना।
नेपाल के मौजूदा हालात पर यही कहा जा सकता है—
👉 “जहां जनता हर रोज़ रोटी का हिसाब करती है, वहां नेता रोज़ कुर्सी का संतुलन साधते हैं।”



