मध्य-पूर्व में शांति की बातें सिर्फ भाषणों में, जमीन पर धुआं और राख
कतर पर इज़राइल का हमला एक बार फिर साबित करता है कि मध्य-पूर्व की राजनीति कभी शांति के लिए नहीं, बल्कि ताक़त के प्रदर्शन के लिए जानी जाती है। यहां नेता अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति के उपदेश बांटते हैं, और जमीनी हकीकत यह है कि मिसाइलें उड़ती हैं, घर जलते हैं और आम लोग शरण ढूंढते हैं।

स्थिति ऐसी है जैसे कोई फुटबॉल मैच चल रहा हो—एक तरफ़ गोलाबारी, दूसरी तरफ़ गोलपोस्ट, और बीच में पिस रही है जनता। फर्क बस इतना है कि स्टेडियम में तालियां बजती हैं, जबकि युद्धभूमि में चीखें सुनाई देती हैं।
मध्य-पूर्व की राजनीति पर यही कहा जा सकता है—
“नेता जीत के आंकड़े गिनते हैं, और जनता अपने मरे हुए रिश्तेदार।”



