नीतीश पुत्र निशांत को ‘Z+’ सुरक्षा

भू-माफियाओं से लोहा लेने वाले विजय सिन्हा की सुरक्षा में कटौती

जनता के टैक्स का कैसा उपयोग?

समाज जागरण पटना जिला संवाददाता:- वेद प्रकाश

पटना/ बिहार की सियासत में सुरक्षा श्रेणियों का बंटवारा एक बार फिर चर्चा और विवादों के केंद्र में है। राज्य सरकार द्वारा हाल ही में लिए गए सुरक्षा संबंधी निर्णयों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कार्यकाल के शुरुआती फैसलों में सबसे चौंकाने वाला निर्णय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को ‘Z+’ श्रेणी की सुरक्षा देना और पूर्व उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा की सुरक्षा को ‘Z+’ से घटाकर ‘Z’ श्रेणी का करना रहा। निशांत कुमार, जो बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के इकलौते पुत्र हैं, वर्तमान में जदयू के सक्रिय सदस्य तो हैं, लेकिन वे कभी किसी महत्वपूर्ण राजनीतिक या सरकारी पद पर नहीं रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि निशांत ने कभी ऐसा कोई सार्वजनिक या साहसिक निर्णय नहीं लिया जिससे उनके कोई धुर विरोधी या शत्रु पैदा हुए हों। वे न तो किसी सामाजिक आंदोलन के अगुआ रहे हैं और न ही किसी विवादित अभियान के नेतृत्वकर्ता। ऐसे में उन्हें राज्य की सर्वोच्च ‘Z+’ श्रेणी की सुरक्षा देना समझ से परे है।

माफियाओं के निशाने पर रहे विजय सिन्हा की सुरक्षा कम वही दूसरी ओर, पूर्व उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा का मामला बिल्कुल उलट है। अपने महज चार-पांच महीने के कार्यकाल के दौरान सिन्हा ने प्रदेश के भू-माफियाओं के खिलाफ एक निर्णायक युद्ध छेड़ा था। सरकारी तंत्र और राजस्व विभाग में गहरी पैठ बना चुके माफिया नेक्सस के खिलाफ उन्होंने कई कड़े फैसले लिए, जिसके कारण वे सीधे तौर पर अपराधियों और भ्रष्ट तत्वों के निशाने पर रहे हैं। थ्रेट परसेप्शन (खतरे की आशंका) अधिक होने के बावजूद उनकी सुरक्षा श्रेणी को घटाना सरकार की प्राथमिकता और इंटेलिजेंस रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगाता है। बिहार सरकार द्वारा सुरक्षा वितरण की यह कार्यशैली केवल बड़े चेहरों तक सीमित नहीं है। राज्य में कई ऐसे नेता भी हैं, जिन्हें ‘X’ और ‘Y’ श्रेणी की सुरक्षा दी गई है, जिनका जनहित या सुरक्षा जोखिम से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं दिखता।


आलोचकों का कहना है कि सुरक्षा श्रेणी अब सुरक्षा के बजाय ‘स्टेटस सिंबल’ बनती जा रही है। आम जनता के खून-पसीने की कमाई से भरे गए टैक्स का उपयोग राजनेताओं के परिजनों और रसूखदारों की सेवा में किया जा रहा है। जमीनी खतरों को नजरअंदाज कर राजनीतिक रसूख के आधार पर सुरक्षा बांटना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। क्या बिहार सरकार सुरक्षा के इन फैसलों पर पुनर्विचार करेगी या जनता की गाढ़ी कमाई इसी तरह ‘खास’ लोगों की सुरक्षा पर खर्च होती रहेगी? यह सवाल अब गलियारों में गूंजने लगा है।

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