समाज जागरण दीपक सरकार
छतरपुर (पलामू):नीलांबर पीतांबर विश्वविद्यालय के कुलानुशासक डॉ आरके झा द्वारा 9 छात्रों पर कार्रवाई हेतु थाने को लिखा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। अपने बल का दुर्प्रयोग कर छात्रों के आंदोलन को रोका नहीं जा सकता है बल्कि उसे और बढ़ावा मिलेगा। विश्वविद्यालय कुलानुशासक को छात्रों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करते हुए बातचीत के द्वारा हल निकालना चाहिए। छात्रों के द्वारा किया गया मांग उचित है।उसे बल प्रयोग करके रोका नहीं जा सकता।याद रहे छात्रों ने जब भी आंदोलन किया है सत्ता तक को बदल दिया है यह विश्वविद्यालय क्या है?

उक्त बातें झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय समिति सदस्य सह पलामू जिला प्रवक्ता चन्दन प्रकाश सिन्हा ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा।जारी किए गए प्रेस विज्ञप्ति में चन्दन प्रकाश सिन्हा ने कहा कि इस पूरे मामले में कुलपति को हस्तक्षेप करना चाहिए।दीक्षांत समारोह पूर्णतः विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं को प्रोत्साहित करने के लिए मनाया जाता है और यदि वही संतुष्ट नहीं है तो फिर दीक्षांत समारोह के क्या मतलब। छात्र-छात्राओं को उनसे कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि इस परिस्थिति का मुख्य कारण भी विश्वविद्यालय का निर्णय ही है।पलामू एक बेहद ही गरीब इलाका है और यहां के अभिभावक किसी प्रकार खेत बारी, सोना चांदी आदि समान बेचकर अपने बच्चों को पढ़ाई करने के लिए बीएड में नामांकन करवाते हैं और विश्वविद्यालय के आदेश के कारण छात्र छात्राओं का भविष्य अंधकारमय दिखाई दे रहा था।इस परिस्थिति में उनके पास आंदोलन के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं था। आखिर मरता क्या नहीं करता। विश्वविद्यालय का यह निर्णय असंवैधानिक एवं गैर जिम्मेदाराना था कि निलाम्बर पीतांबर विश्वविद्यालय में नामांकित छात्रों को दिनेश कॉलेज ऑफ एजुकेशन में ट्रांसफर किया जाए।यह निर्णय प्रदर्शित करता है कि यहां के पदाधिकारीयों को छात्र हित से कोई लेना देना नहीं है। बल्कि निजी संस्थाओं के साथ मिलकर छात्र-छात्राओं को लूटने की मानसिकता थी जिसे विभिन्न छात्र संगठनों ने आंदोलन के द्वारा रोकने की कोशिश की और विश्वविद्यालय कर्मियों को इसी बात का मलाल है।पलामू जिला पहले रांची विश्वविद्यालय के द्वारा संचालित था और नीलांबर पीतांबर विश्वविद्यालय के गठन के बाद भी रांची विश्वविद्यालय ने अपने छात्र छात्राओं को नहीं छोड़ा बैकलॉग के सारी परीक्षाएं लेते हुए उन्हें कोर्स पूरा करने का मौका दिया इससे भी नीलांबर पीतांबर विश्वविद्यालय के कुलपति को सीख लेने की आवश्यकता है। कुलानुशासक को छात्रों के साथ सौहार्दपूर्ण वातावरण में बैठकर बातचीत करते हुए सारे मामले को खत्म कर बृहद तरीके से दीक्षांत समारोह मनाने की आवश्यकता है।रही बात छात्रों के द्वारा कार्यक्रम के दौरान उत्पात मचाने की तो उन्हें यह याद रहना चाहिए कि दीक्षांत समारोह छात्र-छात्राओं के लिए है और ऐसे में कार्यक्रम का विरोध कोई भी छात्र संगठन कर ही नहीं सकता।इनका विरोध विश्वविद्यालय के निर्णय के खिलाफ है ना कि छात्र-छात्राओं से।कुलानुशासक को यह नहीं भूलना चाहिए की वह भारत देश में रह रहे हैं जहां संवैधानिक तरीके से आंदोलन करने का अधिकार प्राप्त है उसे बल प्रयोग करके रोकने की कोशिश की गई तो परिस्थिति और भी खराब हो सकती है। यहां से राजतंत्र खत्म हो गया है।वे एक सेवक मात्र हैं जिन्हें छात्र छात्राओं के हित में निर्णय लेने के लिए नियुक्त किया गया है।जिन छात्र छात्राओं से उन्हें दिक्कत लग रहा है उन्हें अपना दिल बड़ा कर सभी छात्र छात्रों को कार्यक्रम के दौरान अपने साथ बैठाकर उनसे सहयोग लेकर दिक्षांत समारोह करवाने की आवश्यकता है।यह सारे बच्चे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं और आंदोलन कर रहे हैं कोई उग्रवादी या आतंकवाद नहीं जिन पर कार्रवाई की आवश्यकता हो। विश्वविद्यालय के तानाशाही रवैया को देखते हुए झारखंड में राज्य सरकार के हस्ताक्षेप की आवश्यकता महसूस हुई और झारखंड की सरकार ने महाविद्यालय संसोधन बील पारित किया है। जिससे ऐसे पदाधिकारीयों पर नकेल कसा जा सके और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की जा सके। कुलानुशासक को करवाई रोकनी होगी अन्यथा छात्र-छात्राओं के भविष्य पर किसी भी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव पड़ा तो इनके खिलाफ झारखंड मुक्ति मोर्चा जोरदार आंदोलन करेगी।



