ऑनलाइन खरीदारी: सामान मिलता है, सम्मान नहीं | ऑफलाइन बाजार से जुड़ें, समाज को मजबूत बनाएं

नोएडा समाज जागरण डेस्क

भले ही ऑनलाइन सामान मंगवाना आपको सस्ता और सुविधाजनक लगता हो, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह भारतीय परंपरा और सामाजिक ताने-बाने के लिए कितना घातक साबित हो रहा है?
आपको भले ही सामान मिल जाता है, लेकिन क्या आपको चाचा, मामा, भैया, फूफा, बहनजी, माताजी और भाभीजी जैसा सम्मान मिलता है?
ऑनलाइन खरीदारी न केवल छोटे दुकानदारों को निराश कर रही है, बल्कि हमारे समाजिक संबंधों को भी कमजोर कर रही है।

दिवाली के मौके पर भले ही आप जमकर ऑनलाइन खरीदारी कर रहे हों, लेकिन आपके पड़ोसी दुकानदार निराश हैं, क्योंकि उनका सामान नहीं बिक रहा है। इसके लिए केवल ग्राहक ही नहीं, बल्कि दुकानदार भी जिम्मेदार हैं।
जब आप किसी की दुकान से सामान नहीं खरीदेंगे, तो आपकी दुकान से कौन खरीदेगा?


ऑनलाइन खरीदारी के फायदे

ऑनलाइन खरीदारी इसलिए सुविधाजनक लगती है क्योंकि आप मोबाइल पर ही सामान पसंद करते हैं और ऑर्डर कर देते हैं। कुछ ही घंटों में वह आपके घर पहुंच जाता है।
आप सोचते हैं कि आपने जो सामान खरीदा है वह आपके पड़ोसी दुकानदार से सस्ता है।
आप भीड़भाड़ से बच जाते हैं, आने-जाने का किराया नहीं देना पड़ता और गर्मी, धूप या बारिश से भी राहत मिलती है।


ऑनलाइन खरीदारी के नुकसान

आपको लगता है कि ऑनलाइन खरीदारी आपके लिए फायदेमंद है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कई बार ऑनलाइन कंपनियां पुराना या रद्दी सामान भी डिलीवर कर देती हैं?
इसे ऐसे समझिए — “नई पैकेट में पुराना माल।”
अगर आप दुकान पर होते तो आपके पास चुनने का विकल्प होता और आप तुरंत पहचान लेते कि सामान नया है या पुराना। लेकिन ऑनलाइन खरीदारी में आपके पास केवल दो विकल्प होते हैं — रखना या वापस करना।
आप सामान को उलट-पुलट कर तो देख सकते हैं, पर उसकी गुणवत्ता की तुलना नहीं कर सकते।

इसके अलावा, जब आप दुकान पर जाते हैं तो दुकानदार आपको “ग्राहक देवता” मानकर आदरपूर्वक बुलाता है।
क्या कभी किसी ऑनलाइन कंपनी ने आपको आदर से “भैया”, “बहनजी” या “माताजी” कहा है?
थोड़े से पैसे बचाने के चक्कर में हम अपने आसपास के दुकानदारों से मुंह मोड़ लेते हैं।
शायद हमें यह याद भी नहीं रहता कि कोरोना काल में यही पड़ोसी दुकानदार महीनों तक हमें उधार में राशन देते रहे।


समाजिक और मानसिक असर

ऑनलाइन खरीदारी की वजह से आजकल लोगों में अकेलापन बढ़ गया है।
पहले जब हम बाजार जाते थे, तो लोगों से मुलाकात होती थी, हाल-चाल जानने का मौका मिलता था। बच्चे भी घूम-फिर लेते थे।
इससे न केवल सामाजिक जुड़ाव बना रहता था, बल्कि बच्चों में भी आत्मविश्वास और सहनशक्ति बढ़ती थी।
आजकल के माता-पिता खुद मोबाइल में खो गए हैं, और बच्चे भी उसी के आदी हो चुके हैं।
पहले बच्चे त्योहारों का इंतजार करते थे ताकि बाजार जाकर सामान और पटाखे खरीदें, लेकिन अब बच्चे मोबाइल पर ही “ऑनलाइन पटाखे” फोड़ने में व्यस्त हैं। बच्चे त्योहारों का मतलब भी समझ पाते थे।


ऑफलाइन खरीदारी से ही समाज बचेगा

लगातार बढ़ते इंटरनेट उपयोग के बाद सामाजिक ताने-बाने को बचाने का एकमात्र माध्यम अपने पड़ोसी दुकानदार या आसपास के बाजार से खरीदारी करना ही बचा था।
लेकिन आज हालात इसके बिल्कुल विपरीत हैं — खरीदार से लेकर दुकानदार तक, सभी ऑनलाइन दुनिया में व्यस्त हो चुके हैं।
यही कारण है कि जब कोई आफत या विपदा आती है, तो कोई किसी के साथ खड़ा नहीं होता।

हम ऑनलाइन जीवन में इतने मग्न हो गए हैं कि अब हमें यह फर्क भी नहीं पड़ता कि पड़ोसी के घर में दीपक जल रहे हैं या अंधेरा है — बस हमारे मोबाइल की बैटरी चार्ज रहनी चाहिए।

ऑफलाइन खरीदारी हमारे समाज को मजबूत बनाती है और सामाजिक ताने-बाने को जीवित रखती है।
थोड़ा महंगा ही सही, लेकिन पड़ोस के अंकल की दुकान से जरूर खरीदारी कीजिए।
भरोसा रखिए — जब जरूरत पड़ेगी, वही अंकल आपको चाय भी पिलाएंगे और मुश्किल समय में आपके साथ भी खड़े होंगे।


– जूली झा, सह-संपादक
दैनिक समाज जागरण

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