पेठ बाजार पर रोक के दावे हवा-हवाई? जनप्रतिनिधि के रिश्तेदार का नाम आने से बढ़ा विवाद*
विशेष रिपोर्ट : रविंद्र आर्य
गाजियाबाद।
पेठ बाजार को लेकर गाजियाबाद में एक बार फिर बड़ा और गंभीर मोड़ सामने आया है। व्यापारियों और स्थानीय नागरिकों के विरोध के बावजूद बाजार बंद न होने से अब सवाल सीधे सत्ता, प्रशासन और संरक्षण पर उठने लगे हैं। इस पूरे प्रकरण में व्यापारी नेता राजू छावड़ा ने तीखे आरोप लगाते हुए कहा है— “जब रक्षक ही भक्षक बन जाएँ, तब कानून सिर्फ कागजों में रह जाता है।”
राजू छावड़ा के अनुसार, हालिया घटनाक्रम में गाजियाबाद के एक जनप्रतिनिधि के प्रतिनिधि के भाई का नाम सामने आया है। ठेली-पटरी वालों का दावा है कि वे उन्हें नियमित किराया देते हैं। यही नहीं, मौके पर मौजूद ठेकेदार शादाब ने भी यह स्वीकार किया कि ठेलियाँ उसी की लगवाई हुई हैं। इन बयानों ने पूरे मामले को और भी संदिग्ध बना दिया है।

राजू छावड़ा का आरोप है कि भले ही आज सड़कों पर औपचारिक रूप से पेठ बाजार नहीं लगाया गया हो, लेकिन घरों के अंदर, गलियों और निजी परिसरों में बाजार पूरी तरह सक्रिय रहा। हालात लगभग वही रहे जो हर रविवार को देखने को मिलते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि बाजार को रोकने के प्रशासनिक दावे ज़मीनी स्तर पर पूरी तरह विफल साबित हुए हैं।
गौरतलब है कि इससे पहले शासन और प्रशासन की ओर से स्पष्ट रूप से कहा गया था कि पेठ बाजार किसी भी स्थिति में नहीं लगने दिया जाएगा। बावजूद इसके, बाजार का किसी न किसी रूप में संचालित होना यह संकेत देता है कि इसके पीछे ताकतवर सत्ताधारी तत्वों का संरक्षण मौजूद है।
राजू छावड़ा ने व्यापारियों से आह्वान किया है कि अब बिखरे हुए विरोध से काम नहीं चलेगा। सभी प्रभावित व्यापारियों को एकजुट होकर ठोस और बड़ी रणनीति बनानी होगी, ताकि इस कथित अवैध और संरक्षित बाजार व्यवस्था का स्थायी समाधान निकाला जा सके।
फिलहाल यह मामला केवल पेठ बाजार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता, राजनीतिक संरक्षण और कानून के समान अनुप्रयोग पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इन आरोपों पर क्या कार्रवाई करता है या यह मामला भी फाइलों में ही दबकर रह जाएगा।
रिपोर्ट : रविंद्र आर्य



