भारतीय राजनीति में जाति कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन लंबे समय से BJP इस विषय से दूरी बनाकर हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और विकास के नैरेटिव पर चुनाव लड़ती रही है। इसी नैरेटिव ने BJP को 2 से पूर्ण बहुमत और कई राज्यों में सरकार बनाने तक का सफ़र पूरा करवाया
दूसरी ओर कांग्रेस को जाति आधारित राजनीति की पार्टी कहकर घेरती रही। मगर हालिया घटनाक्रम में तस्वीर उलटती दिख रही है। राहुल गांधी और कांग्रेस ने जानबूझकर जाति जनगणना और सामाजिक न्याय को केंद्र में लाकर ऐसा दांव चला है, जिसने BJP को असहज स्थिति में डाल दिया।
कांग्रेस ने जाति-जाति को लेकर ऐसा नैरेटिव सेट करना शुरू किया कि BJP आख़िरकार उसमें फंस गई। कांग्रेस को पता था कि आज नहीं तो कल BJP गलती करेगी, अपने मुद्दे से भटकेगी और वही हुआ।
कांग्रेस के जातीय राजनीति के डर को देखते हुए हिंदुत्ववाद से हटकर BJP लंबे समय से खुद को OBC समाज का सबसे बड़ा मसीहा साबित करने की कोशिश में लगी रही है। प्रधानमंत्री से लेकर संगठन तक, हर मंच से यही संदेश दिया गया कि BJP ने पिछड़े वर्गों को सबसे ज़्यादा प्रतिनिधित्व और सम्मान दिया।
इसी अति-उत्साह में पार्टी ऐसा फैसला कर बैठी, जिसकी कोई सामाजिक मांग ही नहीं थी और यहीं से खेल बिगड़ने लगा। जब UGC जैसे संवेदनशील शैक्षणिक संस्थान से जुड़े फैसलों को जातीय चश्मे से देखा जाने लगा, तब सवाल उठना स्वाभाविक था। न तो सड़क पर आंदोलन था, न ही छात्रों की कोई व्यापक मांग। इसके बावजूद सरकार ने खुद को OBC हितैषी साबित करने के चक्कर में ऐसा कदम उठाया, जिसने सामान्य वर्ग के मतदाताओं को नाराज कर दिया। वही वर्ग, जो लंबे समय से BJP का सबसे भरोसेमंद आधार माना जाता रहा है।
यहीं पर राहुल गांधी और कांग्रेस की असली रणनीति काम कर गई। कांग्रेस चाहती ही यही थी कि BJP जाति के मैदान में उतर आए, क्योंकि इस पिच पर खेलना कांग्रेस को स्वाभाविक रूप से आता है। जैसे ही BJP ने खुद पहल करके जातीय संतुलन साधने की कोशिश की, वह कांग्रेस के बनाए जाल में फँस गई।
सामान्य वर्ग के भीतर यह भावना बनने लगी कि बिना मांग के फैसले थोपे जा रहे हैं, और उनकी चिंताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। BJP की समस्या यह नहीं है कि उसने OBC के लिए सोचा, समस्या यह है कि उसने संतुलन खो दिया। राजनीति में संतुलन ही सबसे बड़ा हथियार होता है, और वही यहाँ चूक गया। राहुल गांधी और कांग्रेस यही चाहते थे कि BJP उनके तय किए एजेंडे पर खेले, और फिलहाल तस्वीर यही दिखा रही है।
राजनीति में सबसे बड़ा नुकसान तब होता है जब आप दूसरे की रणनीति पर प्रतिक्रिया देने लगते हैं, न कि अपनी शर्तों पर खेलते हैं। BJP से यही भूल हो गई। अब सवाल यह नहीं कि जाति राजनीति सही है या गलत, सवाल यह है कि इस बहस को किसने शुरू किया और किसके फायदे में जा रही है।




