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व्यंग्य: “राहुल गांधी और कन्फ्यूजनलैंड की राजनीति”

भाषणों में ‘GPS सिग्नल’ खोने वाले राहुल गांधी राजनीति के ‘हमेशा तैयार खिलाड़ी’, जनता पूछती है – भविष्य का प्रधानमंत्री आखिर कब?

भारतीय राजनीति का एक अनोखा आकर्षण है राहुल गांधी। उन्हें देखकर अक्सर लगता है कि राजनीति उनके लिए एक गंभीर पेशा कम और लंबी छुट्टियों वाला एक्सपेरिमेंट ज़्यादा है। जब बाकी नेता चुनाव के समय जनता के बीच पसीना बहाते हैं, राहुल जी अचानक यूरोप या अमेरिका की सैर पर निकल जाते हैं। मानो चुनाव लोकतंत्र का त्यौहार नहीं, बल्कि गर्मी की छुट्टियाँ हों।

राहुल गांधी का भाषण सुनना एक अलग ही अनुभव है। शुरुआत बड़े आत्मविश्वास से होती है, लेकिन दो मिनट बाद ही दिशा बदल जाती है। जैसे GPS में “रिरूटिंग… रिरूटिंग…” की आवाज़ आती है। जनता ताली बजाने को तैयार रहती है, लेकिन पता ही नहीं चलता कि ताली कब और किस लाइन पर बजानी है।

राहुल जी की राजनीति का सबसे बड़ा करिश्मा यही है कि वो हर मुद्दे को नया एंगल देने में माहिर हैं। जैसे अगर उन्हें पूछा जाए कि “महंगाई क्यों बढ़ रही है?” तो जवाब मिल सकता है – “क्योंकि युवाओं को रोज़गार नहीं मिला, और रोज़गार इसलिए नहीं मिला क्योंकि प्रधानमंत्री सूट पहनते हैं।” यह लॉजिक ऐसा है, जिसे सुनकर गणित के प्रोफेसर भी सोच में पड़ जाएँ।

कांग्रेस पार्टी के नेता उन्हें भविष्य का प्रधानमंत्री मानकर पेश करते रहते हैं। लेकिन जनता अक्सर यही पूछती है – “भविष्य कितना दूर का है? 2047 या 2147?”

राहुल गांधी राजनीति में वैसे ही हैं जैसे एक क्रिकेट टीम में वो खिलाड़ी, जिसे बार-बार ओपनिंग दी जाती है, लेकिन स्कोरकार्ड पर नाम देखकर ही दर्शक अनुमान लगा लेते हैं कि “आज भी आउट जल्दी ही होंगे।”

फिर भी, राहुल जी लोकतंत्र के लिए ज़रूरी हैं। क्योंकि वो मौजूद हैं, तभी भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी को अपने भाषणों में “पप्पू” जैसे शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती। राजनीति का यह मनोरंजन पैकेज अगर गायब हो जाए, तो जनता को संसद की कार्यवाही बड़ी नीरस लगने लगे।


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