आस्था, इतिहास और उपेक्षा—राम के चरणों से पवित्र दशरथ घाट आज भी विकास की राह देख रहा है

सोन–जोहिला संगम पर स्थित वह पावन स्थल, जहाँ वनवास काल में प्रभु श्रीराम ने किया था पिताश्री चक्रवर्ती राजा दशरथ का पिंडदान, आज भी विकास की राह देख रहा है

समाज जागरण
उमरिया। आदिवासी बहुल शहडोल संभाग की धरती पर आज भी ऐसे कई पवित्र स्थल मौजूद हैं, जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के चरण पड़े होने की मान्यता है। यह स्थान न केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक हैं, बल्कि आज भी अपनी पवित्रता के सजीव गवाह बने हुए प्रभु श्रीराम को नमन कर रहे हैं।


रामवन गमन पथ मार्ग से जुड़ा ऐसा ही एक अत्यंत पावन स्थल शहडोल संभाग के उमरिया जिले में शहडोल–मानपुर मार्ग पर ग्राम बिजौरी के समीप स्थित दशरथ घाट है। यह वही स्थल है, जहाँ सोन नदी और जोहिला नदी का पवित्र संगम होता है।


पौराणिक मान्यता और इतिहास:


मान्यता है कि वनवास के दौरान जब प्रभु श्रीराम चित्रकूट से मार्कण्डेय की ओर अग्रसर थे, तभी उन्हें अपने पिता महाराज दशरथ के देहावसान का समाचार प्राप्त हुआ। इसके पश्चात प्रभु श्रीराम माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ आगे बढ़ते हुए दशरथ घाट पहुँचे। यहीं सोन–जोहिला संगम पर उन्होंने पिताश्री राजा दशरथ जी का पिंडदान किया।


सोन नदी आगे चलकर बिहार में पटना के पास गंगा नदी में मिलती है, इसी अवधारणा के आधार पर यहाँ पिंडदान किया गया। प्रभु श्रीराम कुछ समय तक इस स्थल पर ठहरे भी थे। तभी से इस पवित्र स्थान का नाम दशरथ घाट प्रचलित हुआ।


मंदिर और रामवन पथ का नक्शा:


दशरथ घाट पर एक प्रसिद्ध मंदिर स्थित है, जहाँ भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर परिसर में रामवन गमन पथ यात्रा का पूरा नक्शा भी प्रदर्शित है, जिसमें प्रभु श्रीराम की चरण पादुकाएं और उनके वनवास मार्ग का विस्तृत उल्लेख किया गया है—कि अयोध्या से निकलकर प्रभु किन-किन मार्गों से गुजरे और कहाँ-कहाँ उनके पवित्र चरण पड़े।


मनमोहक दृश्य, लेकिन विकास से वंचित:


यह स्थल प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर और अत्यंत मनोहारी है। इसके बावजूद आज तक सरकार या प्रशासन द्वारा इस पवित्र स्थल के विकास की कोई ठोस रूपरेखा तैयार नहीं की गई है। न जनप्रतिनिधियों का ध्यान इस ओर गया और न ही धर्मावलंबियों की संगठित पहल दिखाई देती है। यदि इस स्थल को धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित किया जाए, तो ना केवल आसपास के क्षेत्रों बल्कि देशभर से श्रद्धालुओं का यहाँ आवागमन बढ़ सकता है।


पहुंच मार्ग की समस्या:


दशरथ घाट तक पहुँचने के लिए फिलहाल संकरी गलियों और घनी झाड़ियों से होकर गुजरना पड़ता है। जबकि यह पवित्र स्थल शहडोल से लगभग 40 किलोमीटर और मानपुर से मात्र 20 किलोमीटर की दूरी पर शहडोल–मानपुर मुख्य मार्ग से सिर्फ एक किलोमीटर अंदर स्थित है। उचित सड़क, संकेतक और सुविधाएं विकसित कर इसे बेहतर रूप दिया जा सकता है।


रामवन पथ की आगे की यात्रा:


मान्यताओं के अनुसार, दशरथ घाट से आगे प्रभु श्रीराम माता सीता और लक्ष्मण के साथ अमझोर गंधिया पहुँचे, जहाँ सीतामढ़ी स्थल स्थित है।
आज दशरथ घाट अपनी पवित्रता, इतिहास और आस्था के साथ खड़ा है—बस इंतजार है तो सरकारी पहल और सामाजिक जागरूकता का, ताकि यह स्थल धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर अपनी पहचान बना सके।

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