हम बड़े खुशकिस्मत हैं कि हमें ऐसी सरकार मिली है जो एक ही हाथ से शराब बेचती है और दूसरे हाथ से नशा छुड़ाने का अभियान चलाती है। सुबह अखबार खोलिए तो पहले पन्ने पर “नशामुक्ति अभियान” की खबर मिलेगी और अगले ही पन्ने पर नई शराब की दुकान खुलने का विज्ञापन मुस्कराता नजर आएगा।

सरकार का तर्क बड़ा सरल है—शराब से राजस्व भी चाहिए और समाज को सुधारने का तमगा भी। यानी बोतल सरकार की, ठेका सरकार का, टैक्स सरकार का और नशे की जिम्मेदारी जनता की। अगर कोई नशे में हादसा कर दे तो दोषी नागरिक, लेकिन अगर वही नागरिक शराब न खरीदे तो सरकार का बजट बिगड़ जाए।
नशामुक्ति अभियान में पोस्टर लगते हैं—“नशा छोड़ो, जीवन जोड़ो”, और ठीक बगल में ठेके पर चमचमाता बोर्ड—“आज नई खेप आई है।” समझ नहीं आता कि सरकार जनता को समझा रही है या उलझा रही है।
असल में यह नशामुक्ति नहीं, नीति-मुक्ति अभियान लगता है। जब तक शराब बिक्री बंद करने का साहस नहीं होगा, तब तक नशा छुड़ाने की बातें वही होंगी—जैसे आग बुझाने के लिए माचिस बांटना।
नशा जनता में नहीं, व्यवस्था में है… और वह उतरने का नाम नहीं ले रहा।



