स्कूल मर्जर से गरीब, मजदूर, किसान,अपवँचित वर्ग के बच्चे शिक्षा से होंगे वंचित l
समाज जागरण अनिल कुमार
हरहुआ वाराणसी।
डा0 शैलेन्द्र विक्रम सिंह, जिला मंत्री, उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ वाराणसी ने एक प्रेस वार्ता में कहा कि वर्तमान में विभाग कम छात्र संख्या को आधार बनाकर 50 से कम छात्र संख्य वाले स्कूल का नजदीक के सरकारी स्कूल में मर्ज करने की असंगत कार्यवाही कर रही है, जोकि शिक्षा के बाल अधिकार अधिनियम 2009; जिसके तहत 06 से 14 वर्ष के बच्चों को उनके घर के नजदीक निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, का सीधा अतिक्रमण है l सरकार को यह जानना चाहिए कि बच्चे अगर 1 किमी की परिधि के स्कूल में नहीं आ रहे हैं तो मर्जर वाले स्कूल में कैसे पहुंचेंगे विशेषकर बच्चियाँ?
उन्होंने स्पष्ट कहा कि स्कूल में कम छात्र संख्या का कारण शैक्षिक गुणवत्ता कदापि नहीं है बल्कि शासन की गलत नीतियों के कारण है क्योंकि आरटीई के तहत सरकारी स्कूल में प्रवेश की उम्र 6 वर्ष निर्धारित की गयी है जबकि निजी स्कूल में बच्चे साढ़े तीन वर्ष में ही प्रवेश पा जा रहे हैं, अब तीन वर्ष की स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्हें किस शैक्षिक गुणवत्ता या भौतिक संसाधन के बूते परिषदीय स्कूल में पुनः वापस लाया जा सकता है।
दूसरा कि आरटीई के तहत निजी स्कूल में प्रवेश का 25फीसद कोटा निर्धारित किया गया है, जिसके लिए सरकार बच्चे की फीस प्रतिपूर्ति के साथ-साथ ₹5000 यूनिफार्म, बैग, जूता तथा स्टेशनरी के मद में दे रही है जबकि सरकारी स्कूल के छात्रों को मात्र ₹1200 डीबीटी के तहत उनके अभिभावकों के खाते में दे रही है इस लिहाज से भी सरकारी स्कूल अभिभावकों के लिए कहीं से मुफीद नहीं बैठती l जिसके लिए शिक्षा माफिया एक मान्यता पर हर गली में बिना मान्यता के कानवेंट स्कूल खोलवा कर गठजोड़ कर सरकारी पैसे का बंदरबाँट कर रहे हैं l
तीसरी बात वर्तमान बाल शिशु जन्मदर भी कम छात्र संख्या का एक प्रमुख कारण है क्योंकि इन विद्यालयों में निजी विद्यालयों की तरह वातानुकूलित वाहनों से भरकर अमीर औलादें पढ़ने नहीं आती बल्कि उस गाँव के ही गरीबों के बच्चे पैदल ही शिक्षा ग्रहण करने आते हैं l
सरकारी स्कूल को खैराती स्कूल के अभिशाप से उबारने की जिम्मेदारी सरकार की है न कि शिक्षक की जिसकी सजा आज उसे मिल रही है, जिससे वह मानसिक अवसाद से गुजर रहा है, कल जो स्कूल उसके अभिमान का स्थान था आज वह एक खंडहर में तब्दील होने के अभिशाप का अकारण भागीदार बन रहा है l निजी विद्यालयों के मान्यता के मानक एवं गुणवत्ता को प्रभावी रूप से लागू करते हुए बिना मान्यता के चल रहे असंगत विद्यालयों पर लगाम लगाया जाय l
सरकारी स्कूल को प्रयोगशाला एवं बेजा सूचनाओं के मकड़जाल से निकालते हुए नर्सरी, एलकेजी, यूकेजी में प्रवेश लेने का आदेश पारित करके साढ़े तीन वर्ष से प्रवेश लेने का अधिकार प्रदान किया जाय l आँगनबाड़ी को प्रधानाध्यापकों के पूर्ण नियंत्रण में लाकर जीवंत किया जाय साथ ही कम छात्र संख्या वाले स्कूल में आँगनबाड़ी को मर्ज कर सरकारी विद्यालयों के स्वतंत्र अस्तिव को बनाये रखा जाय l
निजी विद्यालयों में आरटीई के तहत 25फीसद कोटे में प्रवेश लेने वाले छात्रों को फीस प्रतिपूर्ति तथा ₹5000/- का ग्राँट बंद करते हुए निजी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों को मुफ्त अनाज, स्वास्थ्य बीमा, फ्री गैस सहित अन्य सरकारी लाभ से वंचित किया जाय,तब कम छात्र संख्या के स्कूल के शिक्षकों तथा विभागीय अधिकारियों की निजी जिम्मेदारी तय करते हुए प्रशासनिक कार्यवाही सुनिश्चित कर वहाँ के भौगोलिक स्थिति के अनुकूल दक्ष शिक्षकों की तैनाती कर उस स्कूल को इस श्रेणी से निकालने की पहल हो तथा ऐसे प्रतिस्थापनीय शिक्षकों को सम्मान, पुरस्कार संभव हो तो आउट ऑफ़ टर्म प्रमोशन का प्राविधान किया जाय न कि विद्यालय मर्जर की कार्यवाही l
मर्जर से सम्बद्ध शिक्षक उस स्कूल को भी सरप्लस शिक्षक की श्रेणी में ला देगा फिर शिक्षकों का समायोजन एक विकट समस्या बनेगी और विभाग में भ्रष्टाचार का एक खेल शुरू होगा जिससे इन विद्यालयों के वजूद का नया संकट खड़ा होगा और शुरू होगा स्कूल बंद करने का अंतहीन सिलसिला l जबकि स्कूल बंद करना सरकार के निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के संवैधानिक प्रतिबद्धता से मुँह फेरना होगा, जोकि किसी लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के लिए शुभ लक्षण नहीं है क्योंकि शिक्षा के बिना विश्व गुरु बनने की हमारी संकल्पना मात्र ख्याली पुलाव ही सिद्ध होगी l
डा0 शैलेन्द्र विक्रम सिंह
जिला मंत्री
उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक*संघ, वाराणसी l



