श्रीश्री1008 बाबा रति गिरी महाराज के निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में की जा रही है श्रीराम कथा

दैनिक समाज जागरण, जिला संवाददाता। ( महेन्द्र जावला बहल )

बहल, 20 फरवरी। शुक्रवार को श्रीअलख आश्रम बहल में जारी श्रीराम कथा प्रवचन के पांचवें दिन की कथा रामचरितमानस में निस्वार्थ भक्ति और माता-पिता के प्रति संतान के कर्तव्य का पाठ पढ़ाता है। राम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप और विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखने की सीख मिलती है। कथा श्रीअलख आश्रम के महंत बाबा विकास गिरी महाराज के सानिध्य में फाल्गुन महोत्सव श्रीश्री1008 बाबा रति गिरी महाराज के निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में की जा रही है।

कथा प्रवक्ता महंत पारूल भक्त ने रामायण के अयोध्या कांड अध्याय के कैकेई – दशरथ संवाद, केकैई के द्वारा महाराज दशरथ से दो वरदान मांगना, श्री राम कैकेई संवाद, भगवान श्रीराम का माता कौशल्या से विदा मांगने जाना और श्रीराम कौशल्या संवाद आज के मुख्य प्रसंग रहे। कथा ने श्रोताओं को भावविभोर कर रख दिया वहीं श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास व वन गमन के अवसरों ने श्रोताओं में मायूसी स्पष्ट झलक रही थी और अश्रु फुट पड़े भी दिखाई दे रहे थे। कथा में यह एक अत्यंत भावुक और नाटकीय मोड़ है, जहां मंथरा के बहकावे में आकर रानी कैकेई ने राजा दशरथ से कोपभवन में दो वरदान मांगे। इन वरदानों के अंतर्गत भरत का राज्याभिषेक और श्री राम को 14 वर्षों का वनवास मांगा गया। यह संवाद राम के जीवन और भारतीय इतिहास का मुख्य मोड़ बना।

कथा व्यास महंत पारूल भक्त ने कैकेई-दशरथ संवाद के मुख्य प्रसंग के कोपभवन की घटना में राम के राज्याभिषेक की खुशी के बीच, कैकेई कोपभवन (नाराज होने का स्थान) में चली जाती हैं, जिससे राजा दशरथ विचलित हो जाते हैं। महाराजा दशरथ रानी कैकेई ने युद्ध के दौरान दशरथ द्वारा दिए गए दो पुराने वचनों को याद दिलाया। उन्होंने पहला वरदान में भरत का राज्याभिषेक और दूसरा वरदान राम को 14 वर्षों का वनवास मांग कर डाली। कथा व्यास स्वयं भी भावुक होते हुए कहा कि राजा दशरथ हैरान रह जाते हैं और कैकेई से राम को न भेजने की विनती करते हैं, लेकिन कैकेई अपनी बात पर अड़ी रहती हैं और उन्हें ‘सत्य-प्रतिज्ञा’ (वचन के पक्के) होने की याद दिलाकर मजबूर करती हैं।

प्रसंग में विलाप और विवशता ने श्रोताओं को दुःखी मन कर दिया। केकैई के वचनों से दुःखी हो राजा दशरथ जमीन पर गिर पड़ते हैं और कैकेई के सामने पूरी तरह असहाय हो जाते हैं। कथा में इस प्रसंग ने राजा दशरथ को वचनों से बंधे होने के कारण गहरी निराशा में डाल दिया और अंततः राम को वनवास जाना पड़ा, जो धर्म और त्याग का प्रतीक बना रामकथा में श्री राम-कैकेई संवाद (अयोध्याकांड) मर्यादा, त्याग और निस्वार्थ प्रेम का सर्वोच्च उदाहरण है। जब कैकेई ने मंथरा के प्रभाव में राम के लिए 14 वर्ष का वनवास और भरत के लिए राजसिंहासन मांगा, तो श्रीराम ने इसे सहज स्वीकार किया। उन्होंने न केवल माता को सम्मान दिया, बल्कि पिता के वचनों की रक्षा के लिए सहर्ष वन गमन किया।


राम का आदर्श: श्रीराम ने वनवास के निर्णय पर रत्ती भर भी क्रोध न करते हुए, माता की इच्छा को शिरोधार्य किया और कहा कि वे पिता की आज्ञा पालन के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।
संवाद की गंभीरता इस संवाद में श्रीराम का धैर्य और कैकेई का अपने निर्णय पर अड़े रहना, एक महान मार्मिक दृश्य प्रस्तुत करता है।

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