“इतिहास से कूड़ाघर तक: बालूपुरा पक्का तालाब के पुनर्जीवन की उठती जनआवाज़”*
विशेष समाचार लेख: रविंद्र आर्य
रिपोर्ट: गाज़ियाबाद सिटी
गाज़ियाबाद सिटी क्षेत्र के बालूपुरा स्थित ऐतिहासिक पक्का तालाब आज उपेक्षा, अतिक्रमण और प्रशासनिक उदासीनता का शिकार होकर अपनी पहचान खोता जा रहा है। कभी शहर की जल-व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार और सांस्कृतिक आयोजनों का केंद्र रहा यह तालाब अब सूखकर कूड़ाघर जैसी स्थिति में पहुँच गया है।

स्थानीय निवासियों का मानना है कि यदि तालाब का वैज्ञानिक एवं स्थायी जीर्णोद्धार किया जाए, तो बालूपुरा, जटवाड़ा, डासना गेट, रमते राम रोड और मालीवाड़ा जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में भूजल स्तर में सुधार होगा तथा पानी की किल्लत की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है।
पक्का तालाब केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक स्मृतियों का जीवंत प्रतीक रहा है। एक समय रामलीला के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और सीता के सरयू पार कर वन गमन का दृश्य इसी तालाब में मंचित किया जाता था, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते थे। तालाब के सूखने के साथ यह परंपरा भी समाप्त हो गई, जिससे शहर की सांस्कृतिक पहचान को गहरा आघात पहुँचा है।
वर्तमान में तालाब की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। इसके मुख्य द्वार के सामने प्रतिदिन कूड़ा डाला जाता है, जिससे यह स्थान कूड़ाघर जैसा प्रतीत होता है। बेसहारा पशुओं का जमावड़ा लगा रहता है और राहगीरों को दुर्गंध एवं गंदगी का सामना करना पड़ता है। तालाब के भीतर सूखी जमीन पर बच्चे गिल्ली डंडा खेलते हैं, जबकि शाम के समय कुछ लोग इसे शराबखोरी और नशाखोरी का अड्डा बना देते हैं। जुआ, आपराधिक गतिविधियाँ और मृत पशुओं को दबाने जैसी घटनाओं ने इस क्षेत्र की सामाजिक सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, ठेकेदार का एक नीला लोहे का कंटेनर भी असामाजिक गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है, जहाँ नशाखोरी और चोरी जैसी घटनाएँ होती रहती हैं।
तालाब के सूखने का एक प्रमुख कारण उन नालों और नालियों पर हुआ अतिक्रमण है, जिनसे वर्षाजल और कॉलोनियों का पानी तालाब में पहुँचता था। पहले इन जलमार्गों के कारण मानसून में जलभराव की समस्या नहीं होती थी, लेकिन अब पक्के निर्माणों ने जल प्रवाह रोक दिया है, जिससे तालाब सूख गया और आसपास के क्षेत्रों में जल संकट बढ़ गया। इससे पहले तालाब को पुनर्जीवित करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए थे, परंतु कुछ ही समय बाद स्थिति फिर बदहाल हो गई। मछली पालन योजना भी शुरू की गई थी, लेकिन मंदिर स्तनीय जनता ओर पार्षद के विरोध और अन्य कारणों से बंद हो गई, जिसके बाद तालाब की निगरानी और साफ-सफाई लगभग समाप्त हो गई। आज वही मंदिर का सभी कूड़ा पक्का तालाब की दीवारों पर अंदर फेका जाता है अजीब विडंबना है निगम को जनता का सहयोग ना मिलना दुर्भाग्यपूर्ण है। कारण अनेको मे एक करण ये भी है, ओवरसीज़ कंपनी द्वारा रखरखाव की जिम्मेदारी लेने और समय-समय पर सफाई कराने के प्रयास भी अनुबंध समाप्त होने के साथ बंद हो गए।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अब नगर प्रशासन को नए सिरे से व्यापक योजना बनानी होगी, जिसमें जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और राजस्व सृजन को साथ लेकर चलना होगा। विशेषज्ञों का सुझाव है कि तालाब तक जल प्रवाह बहाल किया जाए, आसपास अतिक्रमण हटाया जाए और इसे वर्षाजल संचयन का मॉडल बनाया जाए। तालाब परिसर को हरित क्षेत्र, फूलवारी या पेशेवर पौधशाला (नर्सरी) के रूप में विकसित कर नगर निगम राजस्व भी बढ़ा सकता है। इसके अतिरिक्त CSR, NGO या ठेका मॉडल के माध्यम से स्थायी रखरखाव सुनिश्चित किया जा सकता है तथा निगरानी बढ़ाकर असामाजिक गतिविधियों पर रोक लगाई जा सकती है।
पक्का तालाब का पुनर्जीवन केवल एक जलाशय को बचाने का प्रयास नहीं होगा, बल्कि यह गाज़ियाबाद की पर्यावरणीय सुरक्षा, सांस्कृतिक विरासत और आने वाली पीढ़ियों के जल भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। स्थानीय निवासी लंबे समय से इसकी मांग कर रहे हैं और अब देखना यह है कि प्रशासन इस जनआवाज़ को कब तक अनसुना करता है या इसे शहर के पुनरुत्थान का अवसर बनाता है।
रिपोर्ट: रविंद्र आर्य




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