
“दशहरे पर शस्त्र पूजन: सुरेश चव्हाणके ने बताया सनातन धर्म का वास्तविक अर्थ—दया, करुणा और आत्मरक्षा”*
रिपोर्ट : विशेष संवाददाता / रविंद्र आर्य
दिल्ली/नोएडा, विशेष संवाददाता :
दशहरा पर्व का महत्व केवल राम-रावण युद्ध की कथा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की आत्मरक्षा और धर्म की स्थापना की अनवरत परंपरा का प्रतीक भी है। सनातन संस्कृति में शस्त्र पूजन केवल अस्त्र-शस्त्र की महिमा का गुणगान नहीं, बल्कि उनकी मर्यादा और जिम्मेदारी का भी स्मरण है। इसी परंपरा को सुदर्शन न्यूज़ चैनल के प्रमुख और हिंदू राष्ट्रवाद की वैचारिक धारा को नई परिभाषा देने वाले सुरेश चव्हाणके हर वर्ष अपने नेतृत्व में शस्त्र पूजन कर जीवित रखते हैं।
*शस्त्र पूजन का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व*
भारत की परंपरा में अस्त्र-शस्त्र को पूजनीय माना गया है। यह केवल युद्ध और हिंसा का साधन नहीं, बल्कि धर्म, न्याय और सत्य की रक्षा का माध्यम रहे हैं। देवी दुर्गा के हाथों में शस्त्र हों या भगवान राम का धनुष—ये प्रतीक हमेशा यह दर्शाते हैं कि जब अधर्म और अन्याय अत्यधिक बढ़ जाए, तब शस्त्र उठाना धर्म का कर्तव्य बन जाता है।
दशहरे पर शस्त्र पूजन का आयोजन इसी गहरी सांस्कृतिक स्मृति को जीवित करता है। यह हमें याद दिलाता है कि शस्त्र निर्दोषों को डराने या आतंक फैलाने के लिए नहीं, बल्कि केवल अन्याय और दुष्टता के विनाश के लिए हैं।
*सुरेश चव्हाणके और सनातन दृष्टिकोण*
सुरेश चव्हाणके स्पष्ट करते हैं कि सनातन धर्म का आधार हिंसा नहीं, बल्कि दया, करुणा और मानवता है। शस्त्र पूजन का आशय यह नहीं कि हिंदू समाज कट्टरता की राह पर चले या किसी विचारधारा को भयभीत करे। इसका अर्थ केवल और केवल आत्मरक्षा और धर्म की स्थापना है।
आज जब इस्लामी कट्टरता खुले आम हिंसा और आतंक का वातावरण बना रही है, ऐसे समय में शस्त्र पूजन हमें याद दिलाता है कि सनातन धर्म केवल आत्मरक्षा के लिए ही शस्त्र उठाता है। इतिहास गवाह है कि हर बार अन्याय पराजित हुआ है और सनातन धर्म ने विजय पाई है।
*दशहरा और आत्मरक्षा का संदेश*
शस्त्र हमारी सनातन परंपरा का गौरव हैं।
ये केवल लोहे के हथियार नहीं,
बल्कि राष्ट्र रक्षा, धर्म सुरक्षा और अन्याय के विनाश का संकल्प हैं।
आज सुदर्शन परिवार ने शस्त्र पूजन कर यह घोषणा की—
हम केवल कलम से नहीं,
बल्कि शौर्य और संकल्प से भी
भारत माता की अखंडता की रक्षा करेंगे।
धर्म के शत्रुओं के लिए
शस्त्र हमारी ढाल भी हैं और प्रहार भी।
*“आत्मरक्षा ही सर्वोच्च धर्म है और करुणा ही सनातन संस्कृति की धरोहर है — यही दशहरा हमें याद दिलाता है।”*
सेक्टर-57, नोएडा स्थित मुख्यालय में सुदर्शन न्यूज़ के प्रधान संपादक डॉ. सुरेश चव्हाणके ने विजयादशमी के उपलक्ष्य में शस्त्र पूजन समारोह का आयोजन करते हुए समाज को “चलो सुदर्शन मुख्यालय” का आह्वान किया और हिंदू समाज से शास्त्र (ज्ञान) के साथ शस्त्र (लाइसेंसी हथियार) का संकल्प लेने की अपील की।
*दशहरे से मिलने वाली शिक्षा*
• शस्त्र का प्रयोग केवल अन्याय और अत्याचार को समाप्त करने के लिए हो।
• मानवता, करुणा और दया भाव सनातन धर्म की आत्मा है।
• आत्मरक्षा धर्म है, किंतु आक्रामकता और आतंक अधर्म।
दशहरा सिखाता है कि धर्म की रक्षा हेतु शस्त्र आवश्यक हैं, पर उनका उद्देश्य केवल शांति और न्याय की स्थापना होना चाहिए। सुरेश चव्हाणके का शस्त्र पूजन इस सनातनी परंपरा का जीवंत प्रतीक है, जो आज भी समाज को यह प्रेरणा देता है कि आत्मरक्षा ही सर्वोच्च धर्म है और करुणा उसकी आत्मा।
*दशहरा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ऐतिहासिक प्रसंग*
सुरेश चव्हाणके ने बताया कि ठीक 100 वर्ष पहले विजयादशमी (1925) के दिन ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य से हुई थी। यह संयोग दर्शाता है कि दशहरा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि धर्म और राष्ट्र रक्षा का प्रतीक भी है।
इस अवसर पर सुरेश चव्हाणके ने शस्त्र पूजन करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के प्रत्येक कार्यकर्ता को हार्दिक शुभकामनाएँ और कृतज्ञ प्रणाम अर्पित किया।
यह आयोजन सुदर्शन न्यूज़ परिवार के तत्वावधान में सम्पन्न हुआ।
✦ विशेष उद्धरण ✦
*“धर्म की रक्षा ही शस्त्र पूजन का वास्तविक उद्देश्य है, वास्तव में आत्मरक्षा धर्म है, आतंक अधर्म।”*
— रविंद्र आर्य
(विश्लेषणात्मक पत्रकार, लेखक और भारतीय लोकसंस्कृति के संवाहक)




